जानिए क्यों हर साल स्नान पूर्णिमा के बाद 15 दिन बीमार होते हैं भगवान जगन्नाथ

Odisha News: ओडिशा के पुरी में स्थित विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ मंदिर में इस साल भव्य रथयात्रा का पावन पर्व 16 जुलाई से शुरू होकर 24 जुलाई तक चलेगा। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होने वाला यह ऐतिहासिक उत्सव सनातन धर्म में अटूट आस्था, प्राचीन परंपरा और अनन्य भक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।

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इस महापर्व के दौरान भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा जी भव्य रथों पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं। इस आलौकिक दृश्य का साक्षी बनने और अपने आराध्य के साक्षात दर्शन करने के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं, जिससे पूरी धर्मनगरी पूरी तरह भक्तिमय हो जाती है।

स्नान पूर्णिमा के बाद बंद रहते हैं कपाट

रथयात्रा के शुभारंभ से ठीक पहले ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा पर स्नान पूर्णिमा का विशेष पर्व पारंपरिक रूप से मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर तीनों विग्रहों को 108 पवित्र घड़ों के सुगंधित जल से महास्नान कराया जाता है। इसके बाद भगवान 15 दिनों के लिए बीमार होकर पूर्ण विश्राम कक्ष में चले जाते हैं।

इस विशेष विश्राम अवधि के दौरान मुख्य मंदिर के कपाट आम दर्शनार्थियों के लिए पूरी तरह बंद रहते हैं। इस समय भगवान का विशेष औषधीय उपचार किया जाता है। राजवैद्य की देखरेख में उन्हें जड़ी-बूटियों से तैयार काढ़े और विशेष आयुर्वेदिक औषधियों का भोग लगाया जाता है, ताकि वे जल्दी स्वस्थ हो सकें।

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भक्त माधव दास की अनोखी पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ के बीमार होने की वजह केवल स्नान नहीं, बल्कि अपने परम भक्त के प्रति उनका अगाध प्रेम है। प्राचीन काल में पुरी में माधव दास नाम के एक अनन्य भक्त रहते थे। वे लंबे समय से एक गंभीर और कष्टदायक बीमारी से पूरी तरह पीड़ित थे।

माधव दास ने अपने असहनीय कष्टों से मुक्ति के लिए अपने आराध्य भगवान जगन्नाथ से करुण प्रार्थना की। तब प्रभु ने उन्हें साक्षात दर्शन देकर बताया कि उनके पिछले जन्मों के कर्मों के कारण अभी 15 दिन की बीमारी भोगना बाकी है, क्योंकि कर्मफल को काटना हर जीव के लिए अनिवार्य होता है।

प्रभु ने स्वयं पर लिया भक्त का कष्ट

अपने सच्चे भक्त माधव दास को अत्यंत पीड़ा में तड़पता देखकर कृपालु भगवान जगन्नाथ का हृदय पूरी तरह पिघल गया। भगवान ने भक्त के कर्मों का फल स्वयं भुगतने का निर्णय लिया और उनके अंतिम 15 दिनों की गंभीर बीमारी को पूरी तरह अपने ऊपर ले लिया, जिससे भक्त तुरंत स्वस्थ हो गया।

तभी से हर साल स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान के 15 दिन बीमार रहने की यह अनूठी और पवित्र परंपरा निरंतर चली आ रही है। यह कथा केवल एक धार्मिक मान्यता नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि भगवान अपने सच्चे भक्तों के हर दुख-दर्द को स्वयं हरने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं।

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