Shimla News: हिमाचल प्रदेश के सेब बहुल इलाकों का रंग पूरी तरह बदल रहा है। गर्मियों के मौसम में शिमला से ऊपर के पहाड़ हरे-भरे दिखने के बजाय सफेद चादर से ढके नजर आ रहे हैं। यह कोई ताजा बर्फबारी नहीं बल्कि ओलावृष्टि से करोड़ों रुपये की सेब अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए लगाए गए प्लास्टिक के बड़े एंटी-हेल नेट हैं।
जलवायु परिवर्तन और ओलावृष्टि से बढ़ी बागवानों की मजबूरी
ठियोग, कोटखाई, रोहड़ू और नारकंडा जैसे क्षेत्रों में अब सेब के बागों पर प्लास्टिक जालियां बिछाना सामान्य हो चुका है। बागवानों का कहना है कि बदलते मौसम के कारण अब किसी भी वक्त भयंकर ओलावृष्टि हो जाती है। बिना जाली के खेती करने पर साठ प्रतिशत से अधिक फसल बर्बाद होने का खतरा हमेशा बना रहता है।
बागवान विकेश कंवर और रोहित शर्मा के मुताबिक पहले ओले कुछ खास ऊंचाई वाले इलाकों में ही गिरते थे। अब कम और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी लगातार ओलावृष्टि हो रही है। फसल सुरक्षा के इस अस्थाई शॉर्टकट सॉल्यूशन को अपनाने के लिए किसान लाखों रुपये खर्च कर प्लास्टिक जालियों का सेटअप लगा रहे हैं।
नेट के भीतर बदल रहा माइक्रोक्लाइमेट और सूक्ष्म पर्यावरण
वैज्ञानिक शोध में सामने आया है कि इन एंटी-हेल नेट के कारण बागों के भीतर एक अलग ही माइक्रोक्लाइमेट तैयार हो रहा है। नौणी विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार जाली के नीचे तापमान करीब ग्यारह प्रतिशत कम हो जाता है। इसके साथ ही प्रकाश की मात्रा बत्तीस प्रतिशत घटती है और आर्द्रता में भारी वृद्धि होती है।
पर्यावरण शोधकर्ता अंकुश चौहान और प्रशांत बताते हैं कि जाली के नीचे नमी बढ़ने से फंगल और बैक्टीरियल बीमारियों का खतरा काफी बढ़ गया है। इन नई बीमारियों से निपटने के लिए बागवानों को अब सेब के पौधों पर अतिरिक्त कीटनाशकों और केमिकल दवाइयों का भारी स्प्रे करना पड़ रहा है, जो बेहद चिंताजनक है।
जैव विविधता और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा असर
कीट वैज्ञानिकों के अनुसार हजारों हेक्टेयर में फैली ये कृत्रिम जालियां स्थानीय परागणकर्ताओं की राह में एक बड़ा भौतिक अवरोध बन गई हैं। इससे तितलियों, जंगली मधुमक्खियों और स्थानीय कीट-पतंगों की प्राकृतिक आवाजाही पूरी तरह बाधित हो रही है। यह रुकावट सेब के बगीचों की प्राकृतिक परागण प्रक्रिया को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पहाड़ों पर हाई-डेंसिटी बागवानी मॉडल अपनाने के लिए प्राकृतिक ढलानों को समतल किया जा रहा है। भारी कटिंग से पहाड़ों की जल सोखने की क्षमता और हाइड्रोलॉजी प्रभावित हो रही है। पर्यावरणविदों के मुताबिक इन बदलावों से भविष्य में पहाड़ों पर भूस्खलन का खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
कृषि क्षेत्र में प्लास्टिक कचरे का उभरता नया खतरा
इन प्लास्टिक विरोधी जालियों की औसत उम्र केवल सात से दस वर्ष के बीच होती है। इसके बाद इन्हें बदलना अनिवार्य हो जाता है। हिमाचल के पहाड़ों में बिछाई जा रही इन हजारों टन पुरानी जालियों के निपटान और रीसाइक्लिंग के लिए सरकार के पास फिलहाल कोई ठोस पॉलिसी या संस्थागत व्यवस्था मौजूद नहीं है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि धूप, बारिश और बर्फ के संपर्क में आकर यह प्लास्टिक धीरे-धीरे टूटने लगता है। इससे निकलने वाले खतरनाक माइक्रोप्लास्टिक कण मिट्टी और पेयजल स्रोतों में मिलकर खाद्य श्रृंखला को प्रदूषित कर रहे हैं। बदलते मौसम से निपटने का यह कृत्रिम तरीका भविष्य में एक महासंकट बन सकता है।

