West Bengal News: बंगाल के प्रशासनिक गलियारों में नए सर्कुलर ने हलचल मचा दी है। मुख्य सचिव मनोज अग्रवाल द्वारा जारी इस आदेश ने राज्य के सरकारी कर्मचारियों के मीडिया में बयान देने और सोशल मीडिया पर सक्रियता पर सख्त रोक लगा दी थी। इस फरमान के बाद राज्य में राजनीतिक तनाव काफी बढ़ गया है।
मंगलवार 19 मई को जारी इस आदेश में आईएएस, डब्ल्यूबीसीएस और पुलिस अधिकारियों समेत सभी सरकारी कर्मियों को किसी भी प्रकार की सरकारी आलोचना से प्रतिबंधित कर दिया गया था। साथ ही, बिना पूर्व अनुमति के मीडिया में लेख लिखने या दस्तावेज साझा करने पर भी पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा की गई थी।
विपक्ष के तीखे तेवर और ‘तानाशाही’ के आरोप
आदेश जारी होते ही तृणमूल कांग्रेस ने सरकार पर चौतरफा हमला बोल दिया। पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी और अन्य प्रवक्ताओं ने इसे ‘तानाशाही’ और अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने की कोशिश करार दिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम ने विपक्ष को सरकार के खिलाफ एक बड़ा और मजबूत मुद्दा थमा दिया है।
आंदोलन और जन आक्रोश के सामने आखिरकार सरकार को अपना फैसला बदलना पड़ा। टीएमसी ने दावा किया है कि जनता के भारी दबाव और विपक्ष की नाराजगी के आगे सरकार को झुकना ही पड़ा। प्रशासन के इस पलटी मारने के निर्णय से राज्य की राजनीति में अब नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
क्या है सरकारी फरमान का पूरा असर?
यह आदेश केवल बयानों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें सरकारी नीतियों की इंटरनेट पर आलोचना करने पर भी कार्रवाई का प्रावधान था। कर्मचारियों के बीच इस सर्कुलर से काफी नाराजगी थी। सरकार के बैकफुट पर आने के बाद, प्रशासनिक सेवा से जुड़े लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी की एक बड़ी जीत के तौर पर देखा है।
फिलहाल, राज्य सरकार ने बढ़ते विवाद को देखते हुए अपने रुख में नरमी दिखाई है। हालांकि, प्रशासनिक हलकों में यह सवाल अभी भी कायम है कि क्या भविष्य में सरकार फिर से ऐसा कोई सख्त नियम लागू करेगी। बंगाल की राजनीति में इस घटनाक्रम का असर आने वाले दिनों में और भी स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।
Author: Sourav Banerjee


