किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह: जानिए मिट्टी से ‘भारत रत्न’ तक के सफर की पूरी कहानी!

Politics News: भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को उत्तर प्रदेश के मेरठ (अब हापुड़) के नूरपुर में हुआ था। वह 1857 के क्रांतिकारी राजा नाहर सिंह के वंशज थे। एक किसान परिवार में जन्मे चरण सिंह का पूरा जीवन ग्रामीण भारत की समस्याओं को सुलझाने में बीता।

उन्होंने 1923 में आगरा कॉलेज से बीएससी और 1925 में इतिहास में एमए किया। इसके बाद 1927 में मेरठ कॉलेज से कानून की पढ़ाई पूरी की। महात्मा गांधी से प्रभावित होकर वह आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।

स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश के कृषि मंत्री के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक काम किए। उनका सबसे बड़ा योगदान ‘यूपी जमींदारी उन्मूलन अधिनियम 1950’ था। इसके जरिए उन्होंने लाखों गरीब किसानों को जमीन का मालिकाना हक दिलाया और पटवारी व्यवस्था में सुधार कर भ्रष्टाचार पर लगाम कसी।

गैर-कांग्रेसी राजनीति के मजबूत स्तंभ

चौधरी चरण सिंह ने 1 अप्रैल 1967 को कांग्रेस छोड़ दी। उन्होंने भारतीय क्रांति दल का गठन किया और 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। उन्होंने राजनीति में पिछड़ी और मध्यवर्ती कृषक जातियों को एकजुट कर पारंपरिक राजनीतिक वर्चस्व को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

उत्तर भारत के ग्रामीण समाज को मुख्यधारा में लाने के लिए उन्होंने ‘अजगर’ (अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत) नाम का एक बड़ा सामाजिक गठबंधन तैयार किया। हरित क्रांति के दौर में इस समीकरण ने किसानों और ग्रामीण युवाओं को राजनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद शक्तिशाली बना दिया।

वर्ष 1977 में आपातकाल के बाद देश में ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव हुआ। मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार में चरण सिंह ने गृह मंत्री और वित्त मंत्री के रूप में काम किया। इसके बाद 28 जुलाई 1979 को उन्होंने देश के पांचवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।

ग्रामीण विकास को दी नई दिशा

प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल भले ही कम समय का रहा हो, लेकिन उन्होंने देश की आर्थिक नीतियों का रुख गांवों की तरफ मोड़ दिया। उन्होंने ग्रामीण विकास विभाग को पूर्ण मंत्रालय बनाया। इसके अलावा राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की मजबूत नींव रखी।

29 मई 1987 को 84 वर्ष की आयु में इस महान जननेता का निधन हो गया। दिल्ली में यमुना तट पर स्थित उनके समाधि स्थल को ‘किसान घाट’ कहा जाता है। उनके अद्वितीय योगदान के सम्मान में देश हर साल 23 दिसंबर को ‘राष्ट्रीय किसान दिवस’ मनाता है।

भारत सरकार ने देश के विकास में उनके ऐतिहासिक योगदान को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 30 मार्च 2024 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक भव्य समारोह में उनके पोते जयंत चौधरी को यह सर्वोच्च नागरिक सम्मान सौंपा।

Author: Harikarishan Sharma

Hot this week

Related Articles

Popular Categories