Delhi News: संसद के गलियारों में 4 दिसंबर 1991 का दिन इतिहास में दर्ज है। यह वह दिन था जब गढ़वाल के नवनिर्वाचित सांसद और सेवानिवृत्त मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी ने लोकसभा में अपनी पहली दहाड़ के साथ दिल्ली की राजनीति को हिलाकर रख दिया था। एक फौजी के अनुशासन और पहाड़ी जनमानस के दर्द को जोड़ते हुए उन्होंने स्पष्ट किया था कि वे संसद में केवल हाजिरी लगाने नहीं, बल्कि पहाड़ के हक की लड़ाई लड़ने आए हैं।
दिसंबर 1991 के शीतकालीन सत्र के दौरान जब देश बड़े आर्थिक बदलावों के दौर से गुजर रहा था, तब जनरल खंडूड़ी ने अविभाजित उत्तर प्रदेश के पहाड़ी अंचल में अलग राज्य की मांग को पूरी ताकत से रखा। उनका संबोधन किसी पारंपरिक राजनेता जैसा नहीं था, बल्कि उसमें एक फौजी की कड़क, तथ्यों की स्पष्टता और अपने क्षेत्र के प्रति अटूट संवेदना थी।
लखनऊ की बंद फाइलों के खिलाफ आवाज
लोकसभा में अपने विशेष उल्लेख के दौरान जनरल खंडूड़ी ने तत्कालीन केंद्र सरकार को सीधे कठघरे में खड़ा किया। उन्होंने तर्क दिया कि पर्वतीय जिलों की भौगोलिक स्थिति, वहां की साक्षरता और युवाओं का जज्बा मैदानी इलाकों से पूरी तरह भिन्न है। उन्होंने साफ लहजे में कहा, “पहाड़ों का विकास लखनऊ की बंद फाइलों में कभी नहीं हो सकता।”
उनकी यह स्पष्ट दूरदर्शिता और तर्कपूर्ण शैली ने पूरे सदन को स्तब्ध कर दिया। वे अपनी बात इतने प्रभावशाली तरीके से रखते थे कि सरकार को उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करना पड़ता था। वे केवल विकास की बात नहीं कर रहे थे, बल्कि एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था की नींव रख रहे थे जो पहाड़ों की समस्याओं का स्थायी समाधान कर सके।
मुजफ्फरनगर कांड और राज्य आंदोलन
जनरल खंडूड़ी की सक्रियता सिर्फ 1991 तक सीमित नहीं रही। उत्तराखंड आंदोलन के सबसे काले अध्याय, 2 अक्टूबर 1994 के ‘मुजफ्फरनगर कांड’ के दौरान, उन्होंने प्रशासनिक दमन का मुद्दा संसद में बेहद आक्रामकता के साथ उठाया। तत्कालीन कांग्रेस सरकार को घेरते हुए उन्होंने सवाल किया कि सरकार चुप क्यों है और अलग राज्य का गठन कब होगा?
उनकी यही आवाज और सदन के भीतर निरंतर दबाव का ही नतीजा था कि उत्तराखंड आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान मिली। संसद में उठाई गई उनकी आवाज आखिरकार 9 नवंबर, 2000 को सार्थक हुई, जब भारत के नक्शे पर एक नए राज्य ‘उत्तरांचल’ (अब उत्तराखंड) का उदय हुआ। आज भी संसद में दी गई उनकी वह पहली दहाड़ राज्य के इतिहास में साहस और संघर्ष के प्रतीक के रूप में याद की जाती है।
Author: Harish Rawat


