New Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए दो से अधिक बच्चों की पाबंदी वाली नीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि भारत में घटती प्रजनन दर को देखते हुए इस पुराने कानून की संवैधानिक वैधता पर अब नए सिरे से विचार करना बहुत जरूरी है।
लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। अदालत महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) की कानूनी वैधता को लेकर दायर की गई याचिका पर गहराई से विचार कर रही है।
सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता से जुड़ा है यह पूरा मामला
सुनवाई के दौरान पीठ ने संकेत दिया कि साल 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में दिए पुराने फैसले पर भी दोबारा विचार हो सकता है। यह पूरा मामला काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता से पूरी तरह जुड़ा हुआ है।
तीसरे बच्चे के जन्म के बाद मंगला भीमराव को महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम के तहत अयोग्य ठहराया गया था। राज्य में यह कड़ा कानून 13 सितंबर 2000 से पूरी तरह लागू है। अतिरिक्त कलेक्टर और अतिरिक्त आयुक्त के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को सही माना था।
देश के सात राज्यों के कानूनों की होगी विस्तृत कानूनी समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे विषय को एक बड़ा संवैधानिक मुद्दा माना है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे को न्यायालय मित्र नियुक्त किया है। वे उन सात राज्यों के कानूनों का अध्ययन करेंगी जहां दो बच्चों का नियम लागू है।
इसके साथ ही अदालत ने ‘द इकोनॉमिस्ट’ की उस रिपोर्ट का भी अध्ययन करने को कहा है, जिसमें भारत में तेजी से घटती प्रजनन दर का जिक्र है। याचिकाकर्ता के वकील प्रतीक बंबार्डे को भी इस विषय पर विस्तृत कानूनी और तथ्यात्मक शोध संकलन जमा करने को कहा गया है।
बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई अंतरिम रोक
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 5 अगस्त 2025 को मंगला भीमराव की याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट का कहना था कि तीसरे बच्चे के जन्म प्रमाण पत्र में माता-पिता का नाम दर्ज है। इसलिए इस तथ्य को किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 4 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट के इस सख्त आदेश के अमल पर अंतरिम रोक लगा दी थी। शीर्ष अदालत अब इस पूरी नीति के व्यापक सामाजिक और संवैधानिक पहलुओं को ध्यान में रखकर इस पर अंतिम और बड़ा फैसला सुनाएगी।

