Jodhpur News: राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में आसाराम की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। इस फैसले से जहां पीड़िता के परिवार को थोड़ी राहत मिली है, वहीं सह-आरोपियों की रिहाई से वे बेहद दुखी हैं। हाईकोर्ट ने पर्याप्त सबूत न होने के कारण शिल्पी और शरतचंद्र को बरी कर दिया है।
अदालत का यह फैसला आने के बाद पीड़िता भावुक हो गई। उसने तुरंत अपने पिता को फोन किया और रोते हुए कहा कि शिल्पी और शरतचंद्र दोनों राक्षस हैं। उसने आरोप लगाया कि इन दोनों ने ही साजिश रचकर उसे आसाराम के चंगुल तक पहुंचाया था। इसलिए वे लोग इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगे।
भूत-प्रेत का डर दिखाकर रची गई थी घिनौनी साजिश
पीड़िता के पिता ने बताया कि साल 2013 में उनके पास वार्डन शिल्पी का फोन आया था। शिल्पी ने दावा किया था कि उनकी बेटी पर भूत-प्रेत का साया है। उसने लड़की को ठीक करने के लिए आसाराम बापू के पास ले जाने और विशेष अनुष्ठान कराने का झांसा दिया था। परिवार उसकी बातों में आ गया।
जब वे लोग बेटी को लेकर आसाराम के आश्रम पहुंचे, तो शिल्पी ने माता-पिता को कुटिया के बाहर ही रोक दिया। उसने बहाना बनाया कि बापू अभी सो रहे हैं। इसके बाद वह लड़की को अंदर ले गई और पिछले दरवाजे से चुपके से आसाराम की दूसरी कुटिया में भेज दिया, जहां यह घिनौनी वारदात हुई।
इस पूरी साजिश में छिंदवाड़ा गुरुकुल के डायरेक्टर शरतचंद्र और वार्डन शिल्पी की मुख्य भूमिका थी। इसी वजह से साल 2018 में जोधपुर की विशेष अदालत ने इन दोनों को 20-20 साल की सख्त सजा सुनाई थी। पिता का आरोप है कि आसाराम ने सबूतों के साथ हेरफेर किया, जिसका फायदा इन दोनों को मिला।
इस बहुचर्चित मामले की शुरुआत 21 अप्रैल 2013 को हुई थी, जब पीड़िता ने जोधपुर के महिला थाने में केस दर्ज कराया था। इसके बाद अगस्त 2013 में आसाराम को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। वर्तमान में अंतरिम जमानत पर बाहर चल रहे आसाराम को हाईकोर्ट ने तुरंत सरेंडर करने का आदेश दिया है।
Author: Manish Rathore


