Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद में डीएनए टेस्ट कराने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि केवल बेवफाई के आरोपों को साबित करने के लिए किसी मासूम बच्चे की पहचान और गरिमा को दांव पर नहीं लगाया जा सकता है।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पति अपनी पत्नी के कथित अवैध संबंधों को उजागर करने के लिए अन्य कानूनी साक्ष्यों का सहारा ले सकता है। न्यायमूर्ति रमेश वर्मा ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि वैवाहिक विवादों में वैज्ञानिक जांच को एक सामान्य प्रक्रिया के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।
बच्चों की सामाजिक प्रतिष्ठा और गरिमा की रक्षा जरूरी
हाईकोर्ट ने चंबा परिवार न्यायालय के उस पुराने आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा है, जिसमें याचिकाकर्ता पिता द्वारा अपने तीन बच्चों का डीएनए टेस्ट कराने की मांग ठुकरा दी गई थी। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बेवफाई जैसे संवेदनशील मामलों की जांच किसी भी व्यक्ति के सामाजिक सम्मान को ठेस पहुंचा सकती है।
अदालत ने आगे कहा कि ऐसे पारिवारिक विवादों में विशेष रूप से बच्चों की गरिमा और उनकी निजता की रक्षा करना सबसे जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट भी अपने कई फैसलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि किसी व्यक्ति को जबरन डीएनए टेस्ट के लिए मजबूर करना उसकी निजी जिंदगी में सीधा हस्तक्षेप है।
बिना ठोस आधार के जांच की अनुमति कतई नहीं
कानून के मुताबिक वैध विवाह के दौरान पैदा हुए बच्चे को हमेशा कानूनी रूप से वैध ही माना जाता है। इस धारणा को बदलने के लिए पति-पत्नी के बीच संबंध न होने के बेहद ठोस और पुख्ता प्रमाण पेश करने होते हैं। कोर्ट बिना किसी ठोस आधार के ऐसी जांच की अनुमति नहीं दे सकता।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने यह कदम केवल भरण-पोषण की राशि देने से बचने के उद्देश्य से उठाया है। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि महिला उसकी वैध पत्नी नहीं है और वह पहले से शादीशुदा थी, इसलिए यह शादी अमान्य है।
Author: Sunita Gupta


