पंजाब जैसा वेतन अब सिर्फ एक सपना? हिमाचल हाई कोर्ट के इस फैसले से हजारों कर्मचारियों की उम्मीदों पर फिरा पानी!

Himachal News: हिमाचल प्रदेश के सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतन समानता को लेकर एक बड़ा और झटका देने वाला फैसला आया है। हिमाचल हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि राज्य के कर्मचारियों को सिर्फ इसलिए पंजाब की तर्ज पर वेतन नहीं दिया जा सकता क्योंकि वहां वेतन ज्यादा है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह सांघीवालिया और न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ ने राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण (एसएटी) के उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें सहकारिता विभाग के निरीक्षकों को पंजाब के समान वेतन देने का निर्देश दिया गया था। अदालत के इस सख्त रुख से साफ है कि वेतन का निर्धारण राज्य की अपनी नीतियों और वित्तीय स्थिति पर निर्भर करेगा।

न्यायाधिकरण ने अधिकार क्षेत्र का किया उल्लंघन

हाई कोर्ट ने 25 मार्च 2026 को दिए अपने विस्तृत फैसले में न्यायाधिकरण की कड़ी आलोचना की। अदालत ने माना कि न्यायाधिकरण ने राज्य सरकार को दूसरे राज्य का वेतन ढांचा अपनाने के लिए मजबूर कर अपने कानूनी अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। खंडपीठ के अनुसार, एक राज्य का दूसरे राज्य के वेतन ढांचे का पालन करने का कोई संवैधानिक दायित्व नहीं है। हर राज्य की सेवा शर्तें, भर्ती नियम और वित्तीय विचार अलग होते हैं। इसलिए बिना स्वतंत्र मूल्यांकन के वेतन में समानता का दावा नहीं किया जा सकता।

सिर्फ पदनाम समान होने से वेतन बराबर नहीं होता

अदालत ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया कि न्यायाधिकरण ने केवल पदों के नाम एक जैसे होने के आधार पर फैसला सुनाया था। हाई कोर्ट ने कहा कि वेतन तय करते समय कैडर संरचना, योग्यता और कर्तव्यों जैसे महत्वपूर्ण कारकों को देखना अनिवार्य है। न्यायाधिकरण ने इन बुनियादी पहलुओं की अनदेखी की थी। खंडपीठ ने जोर देकर कहा कि हिमाचल प्रदेश को वेतन संशोधन के लिए इसलिए मजबूर नहीं किया जा सकता क्योंकि किसी पड़ोसी राज्य ने ऐसा किया है।

वेतन विसंगति के अन्य विवादों पर पड़ेगा व्यापक असर

हाई कोर्ट के इस फैसले का असर अब उन सभी लंबित मामलों पर पड़ेगा जहां कर्मचारी अन्य राज्यों के वेतन ढांचे के आधार पर लाभ मांग रहे हैं। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वेतन समानता का दावा अधिकार के रूप में लागू नहीं कराया जा सकता। सरकार की ओर से दायर याचिकाओं को स्वीकार करते हुए अदालत ने संशोधित वेतनमान और पेंशन लाभों के पुन: निर्धारण वाले सभी निर्देशों को दरकिनार कर दिया है। यह फैसला राज्य के खजाने पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ को रोकने की दिशा में भी अहम माना जा रहा है।

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