Uttar Pradesh News: कैराना से समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन अपने बेबाक बयानों के लिए अक्सर चर्चा में रहती हैं। अब उन्होंने एक ऐसी मांग उठा दी है जिसने देश के सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। इकरा हसन ने देश की दो महान शख्सियतों के लिए मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ देने की वकालत की है। उन्होंने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों के जरिए सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख को यह सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने की अपील सरकार से की है। इकरा का मानना है कि इन दोनों महिलाओं ने देश में शिक्षा की अलख जगाने के लिए जो संघर्ष किया, उसे अब तक वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं।
सावित्रीबाई और फातिमा शेख का ऐतिहासिक योगदान
सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षिका माना जाता है। उन्होंने उस दौर में लड़कियों की शिक्षा के लिए आवाज उठाई जब समाज की बेड़ियाँ बहुत सख्त थीं। इकरा हसन ने जोर देकर कहा कि सावित्रीबाई के साथ कंधे से कंधा मिलाकर फातिमा शेख ने भी काम किया था। फातिमा शेख ने ही फुले दंपत्ति को अपने घर में पनाह दी थी जब समाज ने उनका बहिष्कार कर दिया था। फातिमा शेख ने वहां स्कूल खोलकर दबे-कुचले वर्गों और लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया। इकरा के अनुसार, इन दोनों की जोड़ी महिला सशक्तिकरण की सबसे बड़ी मिसाल है।
शिक्षा और समानता की लड़ाई को सम्मान देने की मांग
इकरा हसन ने अपनी मांग के पीछे तर्क दिया कि शिक्षा और सामाजिक समानता के क्षेत्र में इन दोनों का संघर्ष बेमिसाल है। उन्होंने कहा कि आज अगर महिलाएं स्कूल और कॉलेज जा पा रही हैं, तो उसकी नींव इन्हीं महान महिलाओं ने रखी थी। फातिमा शेख को लेकर इकरा का कहना है कि उनके योगदान को इतिहास के पन्नों में वह जगह नहीं मिली जो मिलनी चाहिए थी। उन्हें भारत रत्न देने से न केवल उनके कार्यों को पहचान मिलेगी, बल्कि समाज में सद्भाव का संदेश भी जाएगा।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई इकरा हसन की अपील
इकरा हसन की इस मांग को सोशल मीडिया पर भारी समर्थन मिल रहा है। युवा और छात्र संगठन उनकी इस पहल की तारीफ कर रहे हैं। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में इसे अलग-अलग चश्मे से देखा जा रहा है। कुछ लोग इसे इकरा हसन का मास्टरस्ट्रोक मान रहे हैं, जिससे वह दलित और मुस्लिम समाज को एक साझा मंच पर लाने की कोशिश कर रही हैं। इकरा ने स्पष्ट किया कि यह मांग किसी राजनीति से प्रेरित नहीं है, बल्कि हक की बात है। अब सबकी नजरें केंद्र सरकार पर टिकी हैं कि वह इस संवेदनशील और ऐतिहासिक मांग पर क्या रुख अपनाती है।


