New Delhi News: अमेरिका और इजरायल की सेनाओं द्वारा ईरान पर बमबारी के दौरान भारत ने जानबूझकर इस सैन्य मुहिम से कूटनीतिक दूरी बनाए रखी। लेकिन जैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ ‘शानदार बातचीत’ का ऐलान किया, भारत ने अपने शीर्ष कूटनीतिक चैनल खोल दिए। सोमवार शाम विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो के बीच टेलीफोन पर लंबी बातचीत हुई। ऑपरेशन एपिक फ्यूरी शुरू होने के बाद दोनों देशों के शीर्ष राजनयिकों के बीच यह पहली सीधी वार्ता है।
युद्ध के दौरान भारत ने क्यों बनाई अमेरिका से दूरी?
जब अमेरिकाईरान के बुनियादी ढांचों को तबाह करने पर आमादा था, भारत ने वाशिंगटन के सुर में सुर मिलाने से परहेज किया। इसके पीछे साफ रणनीति थी। ईरान के साथ भारत के गहरे ऐतिहासिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। भारत ईरान के चाबहार पोर्ट का संचालन करता है, जो मध्य एशिया तक पहुंचने का अहम रास्ता है। खाड़ी देशों में लाखों भारतीय काम करते हैं। यदि भारत युद्ध के चरम पर अमेरिका का खुला समर्थन करता, तो क्षेत्र में उसके अपने हित खतरे में पड़ जाते। नई दिल्ली शुरू से ही कूटनीति और संवाद के जरिए तनाव कम करने का पक्षधर रहा है।
ट्रंप के ऐलान के बाद भारत एक्टिव हुआ
जैसेही ट्रंप ने अपने 48 घंटे के सैन्य अल्टीमेटम को ठंडे बस्ते में डाला और ईरान के साथ ‘प्रोडक्टिव’ चर्चा की घोषणा की, भारत ने स्थिति को भांप लिया। नई दिल्ली समझ गई कि अब मध्य पूर्व में गोलियों की जगह कूटनीति की बिसात बिछने वाली है। ऐसे में अमेरिका के साथ सीधे संपर्क में आना जरूरी था ताकि युद्ध के बाद के किसी भी परिदृश्य में भारत के आर्थिक और ऊर्जा हित सुरक्षित रह सकें। जयशंकर और रूबियो की बातचीत का केंद्र बिंदु पश्चिम एशिया का संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव रहा।
ऊर्जा सुरक्षा पर सबसे बड़ा फोकस
जयशंकर नेबातचीत की पुष्टि करते हुए बताया कि ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं पर विशेष रूप से चर्चा हुई। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने और बाल्टिक सागर में रूसी तेल टर्मिनल पर हमले के कारण वैश्विक तेल बाजार में हाहाकार मचा हुआ है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। होर्मुज का बंद होना सीधे तौर पर भारत की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर हमला है। दोनों नेताओं ने संपर्क में बने रहने पर सहमति जताई है। यह बातचीत भारत की संतुलित कूटनीति का प्रतीक है, जो अपने हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक भू-राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाता है।


