New Delhi News: भारत जैसे विशाल और विविध संस्कृति वाले देश में हर कुछ किलोमीटर पर पानी और बोली का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है। भाषाई संवेदनशीलता के इसी ऐतिहासिक बैकग्राउंड को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने एक बहुत ही युगांतकारी फैसला लिया है।
सीबीएसई ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत शैक्षणिक सत्र 2026-27 से कक्षा नौवीं और दसवीं के विद्यार्थियों के लिए ‘त्रि-भाषा नीति’ को अनिवार्य करने का बड़ा निर्णय लिया है। यह ऐतिहासिक कदम भारत के भाषाई परिदृश्य को पूरी तरह पुनर्गठित करने में मददगार साबित होगा।
यह नीति दशकों से चले आ रहे उत्तर और दक्षिण भारत के कृत्रिम भाषाई खांचों को तोड़ने की एक साहसिक कोशिश है। नए नियमों के मुताबिक अब माध्यमिक स्तर पर हर छात्र को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें से कम से कम दो मूल भारतीय भाषाएं होनी अनिवार्य हैं।
अंग्रेजी के एकाधिकार को मिलेगी कड़ी चुनौती
साल 2023 में बने नेशनल कैरिकुलम फ्रेमवर्क में किसी भाषा विशेष का उल्लेख न करते हुए भाषा सीखने के चरणों को आर-1, आर-2 और आर-3 नाम दिया गया था। पहली भाषा यानी आर-1 में छात्र की मातृभाषा या उसके राज्य की स्थानीय भाषा को सर्वोपरि स्थान मिला है।
दूसरी भाषा यानी आर-2 के तहत कोई भी भाषा चुनी जा सकती है। यदि छात्र इसमें अंग्रेजी या किसी विदेशी भाषा (जैसे फ्रेंच या जर्मन) का चयन करता है, तो उसे ‘गैर-भारतीय’ भाषा माना जाएगा। यह नई व्यवस्था सीधे तौर पर अंग्रेजी के एकाधिकार को कड़ी चुनौती देती है।
तीसरी भाषा यानी आर-3 के विकल्प में छात्र को आर-1 और आर-2 के अलावा कोई अन्य भारतीय भाषा ही चुननी होगी। इससे पहले विद्यार्थी तीसरी भाषा के रूप में विदेशी भाषाएं पढ़कर आगे निकल जाते थे, जिससे भारतीय भाषाएं लगातार उपेक्षित होती जा रही थीं।
Internal Assessment से कम होगा पढ़ाई का तनाव
सरकार ने इस नई व्यवस्था में छात्रों की मानसिक स्थिति का भी पूरा ध्यान रखा है। विद्यार्थियों पर बोर्ड परीक्षा का अत्यधिक बोझ न बढ़े, इसके लिए कक्षा दसवीं की बोर्ड परीक्षा केवल दो भाषाओं के लिए होगी, जबकि तीसरी भाषा का मूल्यांकन स्कूल स्तर पर ही किया जाएगा।
तीसरी भाषा के लिए होने वाला यह इंटरनल असेसमेंट छात्रों को बिना किसी मानसिक दबाव के एक नई भारतीय भाषा सीखने का बेहतरीन अवसर प्रदान करता है। आधुनिक न्यूरोसाइंस के शोध भी बताते हैं कि बहुभाषावाद बच्चों के मानसिक और तार्किक विकास के लिए बहुत फायदेमंद है।
जब देश का युवा वर्ग एक-दूसरे राज्यों की भाषाओं को सीखेगा, तो वह क्षेत्रीय संकीर्णता से ऊपर उठेगा। यह आपसी आत्मीयता भविष्य में ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के राष्ट्रीय सपने को पूरी तरह साकार करने की दिशा में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित होगी।
औपनिवेशिक मानसिकता और भाषा पर राजनीति
भारत का भाषाई इतिहास गवाह है कि कैसे भाषा को संवाद के बजाय हमेशा राजनीतिक विभाजन के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। थॉमस मैकाले ने साल 1835 में जो शिक्षा पद्धति लागू की थी, उसका मुख्य उद्देश्य भारतीयों के मन में हीन भावना पैदा करना था।
दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी राजनीतिक दलों ने अपने संकुचित वोट बैंक के लिए इन भाषाई दीवारों को और ऊंचा किया। दक्षिण भारत में ‘हिंदी थोपने’ के नाम पर कई हिंसक आंदोलन खड़े किए गए, तो उत्तर भारत में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति भारी उदासीनता बरती गई।
दूसरी भारतीय भाषा न जानने के कारण तमिलनाडु जैसे राज्यों के युवा राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं और दूसरे राज्यों के रोजगार अवसरों से वंचित रह जाते हैं। नेताओं ने हमेशा जनता को डराया कि दूसरी भाषा सीखने से उनकी खुद की मातृभाषा पूरी तरह नष्ट हो जाएगी।
धरातल पर नीति लागू करने की बड़ी चुनौतियां
सिद्धांत रूप में यह नीति जितनी उत्कृष्ट नजर आती है, धरातल पर इसे पूरी तरह लागू करना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। वर्तमान में बारहवीं के परीक्षा परिणामों से निराश छात्र और उनके अभिभावक इस नए त्रि-भाषा फॉर्मूले को लेकर काफी संशय में दिखाई दे रहे हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने के इतने सालों बाद भी इसे पूरी तरह प्रभावी बनाने की मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था नहीं दिखती। सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या राज्यों में भाषा विशेषज्ञ शिक्षकों की भारी कमी और आधुनिक शिक्षण सामग्री का समय पर तैयार न होना है।
इस सुस्ती को दूर करने के लिए ‘दीक्षा’ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म, एआई टूल्स और वर्चुअल क्लासरूम का बड़े पैमाने पर उपयोग करना होगा। यदि भारत को वैश्विक स्तर पर ज्ञान आधारित महाशक्ति बनना है, तो हमें अपनी भाषाओं के वैभव को खुले मन से स्वीकार करना होगा।
Author: Gaurav Malhotra


