New Delhi News: आधुनिक विकास और अंधाधुंध शहरीकरण की चकाचौंध ने भारत की रातों का प्राकृतिक स्वरूप पूरी तरह बदल दिया है। देश में प्रकाश प्रदूषण (Light Pollution) की समस्या अब इतनी ज्यादा गंभीर हो चुकी है कि प्रमुख महानगरों की रातें प्राकृतिक अंधेरे की तुलना में साठ गुना तक अधिक चमकदार हो गई हैं।
एक नए और चौंकाने वाले वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, देश के भीतर तेजी से पैर पसार रहा यह प्रकाश प्रदूषण अब न सिर्फ इंसानों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि पूरे पर्यावरण और बेजुबान वन्यजीवों के अस्तित्व के लिए भी एक बहुत बड़ा अदृश्य खतरा बनकर सामने आ रहा है।
इन वजहों से गायब हो रही है रातों की स्वाभाविक रंगत
देश में प्रकाश प्रदूषण के तेजी से बढ़ने की सबसे मुख्य वजह आधुनिक एलईडी लाइट्स का अत्यधिक उपयोग, सड़कों पर रात-दिन चमकने वाली स्ट्रीट लाइट्स और वाहनों की लगातार बढ़ती संख्या है। रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय निकायों द्वारा पिछले दस वर्षों में एक करोड़ चौंतीस लाख से अधिक स्ट्रीट लाइट्स लगाई गई हैं।
इसके साथ ही सरकार की महत्वाकांक्षी उजाला योजना के तहत अब तक पूरे देश में छत्तीस करोड़ से अधिक बिजली बचत वाले एलईडी बल्ब बांटे जा चुके हैं। वर्तमान में देश की सड़कों पर पैंतीस करोड़ से ज्यादा रजिस्टर्ड गाड़ियां दौड़ रही हैं, जो रात के समय कृत्रिम रोशनी को बढ़ाती हैं।
आंकड़े बताते हैं कि साल 2014 से 2024 के बीच देश की कुल बिजली खपत दोगुनी होकर लगभग 1,623 टेरावॉट-घंटे तक पहुंच गई है। इन तमाम कारणों से भारत की पचास प्रतिशत से ज्यादा आबादी आज गंभीर प्रकाश प्रदूषण का सामना करने को पूरी तरह मजबूर हो चुकी है।
ग्लोबल लेवल पर भी हालात बेहद चिंताजनक
वैश्विक स्तर पर बात करें तो दुनिया की अस्सी प्रतिशत आबादी रात में अत्यधिक कृत्रिम रोशनी से प्रभावित क्षेत्रों में जीवन बिता रही है। भारत में साल 2014 से 2022 के बीच की अवधि में कृत्रिम रोशनी की चमक में औसतन सोलह प्रतिशत की भारी वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है।
कृत्रिम रोशनी का यह बढ़ता जाल इंसानों की प्राकृतिक नींद, पौधों में फूल खिलने के चक्र और प्रवासी पक्षियों के प्रवासन को बहुत बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। रात के समय कृत्रिम उजाले के कारण मानव शरीर में जरूरी मेलाटोनिन हार्मोन का स्तर बहुत तेजी से घटने लगता है।
मेलाटोनिन हार्मोन की कमी से आम लोगों में डायबिटीज, डिप्रेशन, गंभीर हार्ट डिजीज और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा काफी बढ़ रहा है। वहीं दूसरी तरफ, आसमान में उड़ने वाले प्रवासी पक्षी दिशा भ्रमित होकर हादसों का शिकार हो रहे हैं और कीटों की आबादी घट रही है।
महानगरों में रोशनी का डरावना आंकड़ा
देश के बड़े शहरों में रात का कृत्रिम सन्नाटा और चकाचौंध काफी डरावने स्तर पर पहुंच चुकी है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो सामान्य अंधेरे के मुकाबले देश की राजधानी नई दिल्ली की रातें इकसठ गुना, बेंगलुरु उनसठ गुना और आर्थिक राजधानी मुंबई बावन गुना ज्यादा चमकीली हो चुकी हैं।
इसी तरह अहमदाबाद चौवालिस गुना, इंदौर बयालीस गुना, पटना छतीस गुना और गुलाबी नगरी जयपुर की रातें तैंतीस गुना अधिक चमकदार पाई गई हैं। हाल ही में प्रयागराज में आयोजित कुंभ के दौरान वहां की रातों की चमक में इक्यानबे गुना की रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई थी।
चिंता की बात यह है कि हमारे देश में प्रकाश प्रदूषण की रोकथाम को लेकर अभी तक कोई भी स्पष्ट और कड़ा कानून मौजूद नहीं है। पर्यावरणविदों का कहना है कि वायु, जल और ध्वनि प्रदूषण पर तो कानून हैं, लेकिन इस गंभीर समस्या को अभी तक प्रशासनिक स्तर पर बिल्कुल नजरअंदाज किया जा रहा है।
बचाव के लिए उठाने होंगे ये जरूरी कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बढ़ते खतरे को रोकने के लिए अब हमें तुरंत बेहद ठोस और कड़े कदम उठाने होंगे। इसके समाधान के लिए सड़कों पर लगने वाली स्ट्रीट लाइट्स की सही दिशा, जलने का समय और उनकी तीव्रता को पूरी तरह नियंत्रित करना बहुत जरूरी हो गया है।
इसके अलावा केवल शील्डेड लाइट्स का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जो रोशनी को ऊपर आसमान में फैलने से रोकती हैं। साथ ही, रात को दस बजे के बाद व्यापारिक प्रतिष्ठानों और विज्ञापनों की अनावश्यक रोशनी को पूरी तरह बंद करने जैसे नियम लागू करने की सख्त जरूरत है।
Author: Rajesh Kumar


