जलवायु परिवर्तन की मार: हरियाणा में बढ़ती गर्मी और उमस से घटने लगा भैंसों और संकर गायों का दूध उत्पादन

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Karnal News: जलवायु परिवर्तन की कीमत अब केवल सूखे खेत या बाढ़ से तबाह फसलें ही नहीं चुका रहीं, बल्कि दूध देने वाले मवेशी भी इसकी भारी मार झेल रहे हैं। भारत में इस विषय पर किए गए एक नए साइंटिफिक रिसर्च में बड़ा खुलासा हुआ है। इसके मुताबिक हरियाणा जैसे देश के प्रमुख दुग्ध उत्पादक राज्य में बढ़ती गर्मी और उमस ने दूध उत्पादन पर गहरा असर डाला है।

देश के सबसे बड़े डेयरी अनुसंधान संस्थान, नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट (आईसीएआर-एनडीआरआई) और केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (सीआईआरजी) के वैज्ञानिकों ने यह स्टडी की है। वैज्ञानिकों ने 2004 से 2019 के बीच हरियाणा के 19 जिलों के 1,100 से अधिक गांवों से जुटाए गए 16 वर्षों के आंकड़ों (डेटा) का गहन विश्लेषण किया है।

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जुलाई और अगस्त के महीनों में सबसे ज्यादा गिरावट

यह रिसर्च रिपोर्ट प्रतिष्ठित जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुई है। इसमें दूध उत्पादन के साथ तापमान, आर्द्रता, वर्षा और पोटेंशियल इवैपोट्रांसपिरेशन (पीईटी) जैसे जलवायु संकेतकों का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई और अगस्त में जब तापमान 38°C से ऊपर और आर्द्रता 70% से अधिक होती है, तब दूध उत्पादन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज होती है।

इस मौसम का सबसे बुरा असर भैंसों और संकर (क्रॉसब्रीड) गायों पर पड़ता है, जबकि साहीवाल और हरियाणा जैसी देसी नस्लें इस जलवायु दबाव का मुकाबला बेहतर ढंग से करती हैं। भैंसें सबसे अधिक संवेदनशील हैं क्योंकि उनकी काली त्वचा धूप को ज्यादा सोखती है और उनके शरीर में पसीने की ग्रंथियां कम होती हैं, जिससे अतिरिक्त गर्मी बाहर नहीं निकल पाती।

गर्मी का बेहतर तरीके से सामना करती हैं देसी नस्लें

इस पूरे संकट के बीच एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। भारत की मिट्टी से जुड़ी देसी गायें जैसे साहीवाल और हरियाणा, इस भीषण गर्मी में भी मजबूती से खड़ी हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि देसी गायों की त्वचा ढीली होती है, उनका पसीना बहने का सिस्टम बेहतर होता है और उनका शरीर अंदरूनी तौर पर कम गर्मी पैदा करता है।

इसके विपरीत, विदेशी और संकर नस्लें इस मौसम की मार नहीं झेल पा रही हैं। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एक नए विलेन की भी पहचान की है, जिसे पोटेंशियल इवैपोट्रांसपिरेशन (पीईटी) कहते हैं। यह हवा की वह क्षमता है जो वातावरण, मिट्टी और पशुओं के शरीर से नमी को सोख लेती है। गर्मी के महीनों में जब पीईटी बढ़ता है, तो पशुओं की दूध देने की क्षमता तेजी से घटती है।

भारत है दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश

साइंस एडवांसेज में प्रकाशित एक अन्य पूर्व अध्ययन में भी वैज्ञानिकों ने चेताया था कि बढ़ती गर्मी और नमी से गायों में हीट स्ट्रेस बढ़ रहा है। इससे भारत जैसे देशों में दूध उत्पादन पर गंभीर असर पड़ सकता है। गौरतलब है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है, जो हर साल औसतन 24.8 करोड़ टन दूध का उत्पादन करता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस संकट से बचने के लिए केवल पारंपरिक उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। इसके लिए तापमान आधारित ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ विकसित करना होगा। साथ ही पशुओं के लिए छाया, स्प्रिंकलर और कूलिंग जैसी आधुनिक सुविधाओं का विस्तार करना होगा। भविष्य की दुग्ध सुरक्षा के लिए जलवायु के अनुकूल देसी नस्लों के संरक्षण और ब्रीडिंग को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी है।

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