Mumbai News: मार्केट रेगुलेटर सेबी (SEBI) अब भारतीय शेयर बाजार में ट्रेडिंग का दायरा काफी बढ़ाने जा रहा है। सेबी चीफ तुहिन कांता पांडे ने हाल ही में साफ किया है कि कैपिटल मार्केट (पूंजी बाजार) को और ज्यादा मजबूत बनाने के लिए लॉन्ग-टर्म फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) कॉन्ट्रैक्ट्स पर विशेष फोकस करना बेहद जरूरी है।
फिलहाल भारतीय बाजार में वीकली (साप्ताहिक) या मंथली (मासिक) यानी कम समय वाले सौदों का ही पूरी तरह दबदबा है। लेकिन, अब सेबी चाहता है कि निवेशकों के लिए लंबे समय वाले डेरिवेटिव प्रोडक्ट्स भी आसानी से उपलब्ध हों। बाजार के बड़े जानकारों और ब्रोकरेज हाउसेस ने भी सेबी के इस दूरदर्शी कदम का दिल से स्वागत किया है।
लॉन्ग-टर्म डेरिवेटिव्स सेगमेंट में क्या हैं मुख्य चुनौतियां
मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि लॉन्ग-टर्म डेरिवेटिव्स में सबसे बड़ी रुकावट इसका मौजूदा स्ट्रक्चर (ढांचा) है। एसोसिएशन ऑफ एनएसई मेंबर्स ऑफ इंडिया (ANMI) के राष्ट्रीय अध्यक्ष कमलेश श्रॉफ के मुताबिक, लंबे समय वाले डेरिवेटिव्स तभी लोकप्रिय होंगे जब ट्रेडिंग की ओवरऑल कॉस्ट (लागत) कम होगी और बड़े संस्थागत निवेशक (इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स) इसमें गहरी दिलचस्पी दिखाएंगे।
दुनिया भर के विकसित बाजारों में पेंशन फंड्स और बड़े एसेट मैनेजर्स अपने विशाल पोर्टफोलियो को सुरक्षित रखने के लिए लंबे समय वाले कॉन्ट्रैक्ट्स का ही सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। इसे शॉर्ट-टर्म सट्टेबाजी के बजाय पोर्टफोलियो को मार्केट रिस्क (जोखिम) से बचाने वाले एक बेहतरीन और सुरक्षित हेजिंग टूल के रूप में देखा जाना चाहिए।
सफलता के लिए हैवी मार्जिन नियमों को कम करना बेहद जरूरी
भारत में लॉन्ग-टर्म डेरिवेटिव्स के ज्यादा सफल न होने की एक बड़ी वजह यहां लागू होने वाले बेहद कड़े मार्जिन नियम हैं। हेज फंड मैनेजर मयंक बंसल बताते हैं कि ऑप्शन ग्रीक्स के काम करने के तरीके के कारण, लंबी अवधि के ऑप्शंस में कम अवधि के मुकाबले रिटर्न काफी सीमित होता है। इसके ऊपर, भारत में लंबे समय वाले इंडेक्स डेरिवेटिव्स पर मार्जिन बहुत ज्यादा है।
वर्तमान में सामान्य इंडेक्स कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए यह मार्जिन दर 9.3 प्रतिशत निर्धारित है, जबकि लंबी अवधि के सौदों के लिए इसे बढ़ाकर 17.7 प्रतिशत के उच्च स्तर पर रखा गया है। इसके अलावा, एक्सपोजर मार्जिन भी पूरे 5 प्रतिशत है, जो बड़े निवेशकों को हतोत्साहित करता है। इस वजह से लोग इसमें लिक्विडिटी लगाने से बचते हैं।
मार्केट मेकर्स को टैक्स और ट्रांजेक्शन कॉस्ट में देना होगा फायदा
किसी भी नए फाइनेंशियल प्रोडक्ट को सफल बनाने में मार्केट मेकर्स की भूमिका सबसे अहम होती है। क्रॉस सीज कैपिटल के एमडी राजेश बाहेती का कहना है कि लंबे समय वाले प्रोडक्ट्स की सफलता के लिए ऐसे डेजिग्नेटेड मार्केट मेकर्स चाहिए, जिन्हें दोनों तरफ के कोट्स (खरीद-बिक्री मूल्य) देने पर अच्छा इंसेंटिव या फायदा मिले।
यह फायदा लेन-देन की लागत और सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स (STT) से ज्यादा होना चाहिए। बीएसई (BSE) के एमडी और सीईओ सुंदररामन आर भी सेबी के इस कदम का पूरा समर्थन करते हैं। उनका मानना है कि मौजूदा एसटीटी ढांचे और मार्जिन नियमों को तर्कसंगत और आसान बनाने से इन न्यू प्रोडक्ट्स को अपनाने में काफी तेजी आएगी।
शुरुआत में केवल इंडेक्स से कदम बढ़ाना होगा ज्यादा बेहतर
बाजार के एक्सपर्ट्स ने सुझाव दिया है कि शुरुआत में ऐसे लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स सिर्फ इंडेक्स डेरिवेटिव्स (जैसे निफ्टी या सेंसेक्स) में ही लाए जाने चाहिए। इसका मुख्य फायदा यह है कि इंडेक्स में उतार-चढ़ाव काफी कम होता है, जिससे मार्केट मैनिपुलेशन (हेरफेर) का खतरा न्यूनतम हो जाता है। बाद में लिक्विडिटी बढ़ने पर इसे चुनिंदा शेयरों में लागू किया जा सकता है।
हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि मार्जिन कम होने के बावजूद लंबी अवधि के सौदे कभी भी वीकली या मंथली कॉन्ट्रैक्ट्स जितना हैवी वॉल्यूम नहीं ला सकते। जुलाई में सेबी रिटेल निवेशकों को डेरिवेटिव्स में होने वाले भारी नुकसान पर अपनी एक डिटेल रिपोर्ट भी जारी करने वाला है, जिसके बाद बाजार में कुछ नए कड़े नियम भी देखने को मिल सकते हैं।

