चेतावनी के बाद भी देश में क्यों बढ़ रही गुटखा-खैनी की लत, जानिए थूक साफ करने में रेलवे के खर्च होते हैं कितने करोड़

Health News: भारत में तंबाकू से होने वाले गंभीर नुकसान के बारे में हर कोई अच्छी तरह जानता है। इसके बावजूद देश में धुआं रहित तंबाकू यानी गुटखा, खैनी और जर्दा का सेवन करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। केवल डरावनी चेतावनियां दिखाकर इस लत को खत्म नहीं किया जा सकता।

सिनेमा हॉल में फिल्मों की शुरुआत से पहले कड़े विज्ञापन दिखाए जाते हैं। सिगरेट के पैकेटों पर भी डरावनी तस्वीरें छपी होती हैं। समस्या यह है कि फिल्मों में कई बार धूम्रपान को बेहद आकर्षक अंदाज में दिखाते हैं। इसका युवाओं के दिमाग पर बहुत गलत असर पड़ता है।

हमारे देश में तंबाकू की समस्या केवल सिगरेट पीने तक सीमित नहीं है। यहां रोजाना लगभग बीस करोड़ लोग धुआं रहित तंबाकू उत्पादों का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। ये घातक उत्पाद बेहद कम दाम पर हर छोटी-बड़ी दुकान पर आसानी से मिल जाते हैं।

दुनिया के अस्सी फीसदी गुटखा उपभोक्ता भारत में

एडिनबर्ग विश्वविद्यालय की प्रसिद्ध शोधकर्ता डॉ. मधुरिमा नंदी ने इस विषय पर एक बड़ा अध्ययन किया है। उनके शोध के अनुसार इन धुआं रहित तंबाकू उत्पादों से अठ्ठाइस से अधिक प्रकार के कैंसर पैदा करने वाले खतरनाक तत्व पूरी तरह प्रमाणित हो चुके हैं।

पूरी दुनिया के अस्सी प्रतिशत से अधिक धुआं रहित तंबाकू उपभोक्ता अकेले हमारे देश भारत में रहते हैं। सरकार सिगरेट पर तो भारी टैक्स लगाती है। लेकिन गुटखा और खैनी जैसे उत्पाद टैक्स कम होने के कारण आज भी काफी सस्ते और सुलभ बने हुए हैं।

देश में गुटखा खाने के बाद सरेआम थूकने की समस्या भी बेहद चिंताजनक हो चुकी है। एक आंकड़े के मुताबिक भारतीय हर साल सड़कों पर इतना थूकते हैं जिससे दो सौ ग्यारह बड़े स्विमिंग पूल भर सकते हैं। इस गंदगी से सार्वजनिक संपत्तियों को भारी नुकसान होता है।

रेलवे सफाई पर खर्च करता है बारह सौ करोड़ रुपये

भारतीय रेलवे को हर साल ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों की सफाई पर लगभग बारह सौ करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। भारत में तंबाकू का इतिहास औपनिवेशिक दौर से जुड़ा है। पुर्तगाली लोग साल 1605 में सबसे पहले तंबाकू को गुजरात के इलाकों में लाए थे।

समय के साथ यह नशा भारतीय समाज की जड़ों में गहराई तक समा गया। बाद में गुजरात के व्यापारियों ने गुटखा को छोटे और बेहद सस्ते पाउच में बेचना शुरू किया। दो से पांच रुपये में मिलने के कारण यह सिगरेट से ज्यादा लोकप्रिय हो गया।

विशेषज्ञों के मुताबिक गुटखा में मौजूद निकोटिन इंसानी शरीर में बहुत तेजी से पहुंचता है। इसकी लत सिगरेट पीने की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक घातक होती है। सिगरेट का सेवन संपन्न वर्ग करता है जबकि गुटखा का शिकार गरीब वर्ग होता है।

भूख दबाने के लिए भोजन के विकल्प में इस्तेमाल

डॉ. मधुरिमा नंदी के अनुसार कम शिक्षा, ग्रामीण परिवेश और कमजोर आर्थिक स्थिति ही इस लत के मुख्य कारण हैं। इसके अलावा दोस्तों का दबाव और परिवार की पुरानी आदतें भी जिम्मेदार हैं। दैनिक मजदूरों के लिए यह सस्ता नशा एक मजबूरी बन जाता है।

गुटखा में मौजूद निकोटिन इंसान की भूख को कुछ समय के लिए पूरी तरह दबा देता है। इसी वजह से आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोग इसे भोजन के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करते हैं। दिल्ली के एक बच्चे ने बताया कि गुटखा खाने से भूख नहीं लगती।

ग्रामीण भारत के सबसे गरीब परिवार अपने कुल बजट का लगभग चार प्रतिशत हिस्सा तंबाकू पर बर्बाद कर देते हैं। इसके विपरीत वे बच्चों की पढ़ाई पर केवल ढाई प्रतिशत ही खर्च करते हैं। इस लत के कारण लाखों परिवार हर साल तबाह हो रहे हैं।

तंबाकू जनित बीमारियों से गरीब हो रहे हैं लोग

तंबाकू से होने वाली जानलेवा बीमारियों के कारण हर साल करीब एक करोड़ चौरासी लाख भारतीय अत्यधिक गरीबी के दलदल में धंस जाते हैं। कई परिवार अपने मुख्य कमाने वाले सदस्य को खो देते हैं। तंबाकू उद्योग लोगों की इसी मजबूरी का फायदा उठाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन उत्पादों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से अवैध बाजार पनप सकता है। इसके बजाय सरकार को इन उत्पादों को महंगा और कम सुलभ बनाना चाहिए। साल 2011 में गुटखा बैन होने पर कंपनियों ने एक नई कानूनी खामी ढूंढ ली थी।

कंपनियों ने तंबाकू और फ्लेवरिंग सामग्री को अलग-अलग पैकेटों में बेचना शुरू कर दिया था। ग्राहक इन्हें खुद मिलाकर गुटखा तैयार कर लेते हैं। इस कानूनी खामी को तुरंत बंद करने की सख्त जरूरत है ताकि युवाओं को इस जहर से बचाया जा सके।

तंबाकू नियंत्रण के लिए कड़े नियमों की जरूरत

रिपोर्ट में गुटखा के लिए न्यूनतम पैकेट कीमत बीस से तीस रुपये तय करने की पुरजोर सिफारिश की गई है। इसके अलावा प्लास्टिक पैकिंग पर पूरी तरह रोक लगाने और तंबाकू बेचने के लिए विशेष सरकारी लाइसेंस अनिवार्य करने की मांग की गई है।

सरकार को तंबाकू उत्पाद खरीदने की न्यूनतम उम्र अठारह से बढ़ाकर इक्कीस साल कर देनी चाहिए। डॉ. मधुरिमा नंदी का कहना है कि इसके लिए सख्त टैक्स नीति और प्रभावी तंबाकू नियंत्रण कानून जमीन पर लागू करने की बेहद जरूरत है।

केवल विज्ञापनों के जरिए जागरूकता फैलाने से यह जमीनी समस्या कभी हल नहीं होगी। जब तक ये उत्पाद सस्ते और आसानी से उपलब्ध रहेंगे, तब तक इनकी खपत नहीं रुकेगी। इसके सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणाम समाज को लगातार झेलने पड़ेंगे।

Author: Asha Thakur

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