Delhi News: भारत निर्वाचन आयोग ने देश में मतदाता सूची को पूरी तरह अपडेट करने का बड़ा फैसला किया है। इसके लिए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर के तीसरे चरण की शुरुआत हो चुकी है। बूथ स्तर पर वोटरों के दस्तावेजों और पहचान पत्र की गहन जांच की जा रही है।
चुनाव आयोग का यह विशेष अभियान पूरे एक महीने तक चलेगा। इसके ठीक एक हफ्ते बाद आयोग मतदाता सूची का पहला ड्राफ्ट जारी करेगा। यह एक कच्ची सूची होगी, जिसमें आम जनता को अपनी आपत्तियां दर्ज कराने और नाम जुड़वाने का पूरा मौका मिलेगा।
यदि वेरिफिकेशन के दौरान किसी नागरिक का नाम छूट जाता है, तो वह ड्राफ्ट लिस्ट देखकर आवेदन कर सकता है। सही दस्तावेज होने पर भी नाम न जुड़ने पर शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। वोटरों को दावे और आपत्तियां दर्ज करने के लिए एक महीने का समय मिलेगा।
जनता से मिले सभी दावों और अपीलों की जांच के लिए सरकारी कर्मचारियों को एक महीने का अतिरिक्त समय मिलेगा। वे सभी दस्तावेजों का दोबारा सत्यापन करेंगे। इस पूरी प्रक्रिया के बाद ही राज्यों में अंतिम और शुद्ध वोटर लिस्ट जारी की जाएगी।
जानिए किस राज्य में कब आएगी अंतिम वोटर लिस्ट
देश के 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 37.74 करोड़ वोटरों की जांच का यह महाअभियान दिसंबर तक चलेगा। सभी राज्यों में यह प्रक्रिया अलग-अलग समूहों में होगी। ओडिशा, सिक्किम, मणिपुर और मिजोरम में काम शुरू हो चुका है, जहां फाइनल लिस्ट छह सितंबर को आएगी।
उत्तराखंड में यह अभियान आठ जून से शुरू होकर पंद्रह सितंबर को अंतिम सूची के साथ समाप्त होगा। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा और चंडीगढ़ में पंद्रह जून से काम शुरू होगा। इन राज्यों में नई और संशोधित सूची बाईस सितंबर को जारी की जाएगी।
पंजाब और तेलंगाना में यह प्रक्रिया पच्चीस जून से शुरू होकर एक अक्टूबर को पूरी होगी। दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक, झारखंड और मेघालय में तीस जून से जांच होगी और सात अक्टूबर को फाइनल लिस्ट आएगी। नागालैंड और त्रिपुरा में यह काम नवंबर और दिसंबर तक चलेगा।
आखिर क्या है एसआईआर और क्यों पड़ी जरूरत
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर का मुख्य उद्देश्य वोटर लिस्ट को पूरी तरह त्रुटिहीन बनाना है। भारत का हर वह नागरिक जो अठारह वर्ष का हो चुका है, वह वोटर बन सकता है। इसके लिए नागरिकता और उम्र से जुड़े कानूनी दस्तावेज जरूरी होते हैं।
लोग अक्सर रोजगार या अन्य कारणों से अपना पुराना निवास स्थान छोड़ देते हैं। नई जगह जाने पर वे वहां का वोटर कार्ड बनवा लेते हैं, लेकिन पुरानी जगह से नाम नहीं हटता। इसके अलावा नए युवा मतदाता लगातार इस सूची में जुड़ते चले जाते हैं।
कई बार लोग जानबूझकर अलग-अलग जगहों से वोटर आईडी कार्ड बनवा लेते हैं। वे राजनीतिक लाभ या सरकारी योजनाओं का गलत फायदा उठाने के लिए ऐसा करते हैं। बिना नागरिकता के वोटर कार्ड बनवाना और एक से ज्यादा आईडी रखना गंभीर कानूनन जुर्म है।
आयोग मुख्य रूप से चार श्रेणियों पर फोकस कर रहा है। इनमें अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट वोटर शामिल हैं। इन चारों श्रेणियों के डेटा को हटाकर लिस्ट को बिल्कुल साफ करना ही एसआईआर कहलाता है। इससे फर्जी मतदान पर पूरी तरह रोक लगती है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के फैसले को माना सही
संवैधानिक नियम चुनाव आयोग को मतदाता सूची में सुधार के लिए एसआईआर कराने का पूरा अधिकार देते हैं। देश की सर्वोच्च अदालत ने भी आयोग की इस प्रक्रिया को सही ठहराया है। तेजी से हुए शहरीकरण के कारण वोटर लिस्ट में बड़ी गड़बड़ियां सामने आई थीं।
उच्चतम न्यायालय ने साफ किया है कि लिस्ट से नाम कटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं है। चुनाव आयोग नागरिकता का सर्टिफिकेट नहीं बांटता है। बिहार के एक मामले में कोर्ट ने कहा कि बाहर हुए लोगों को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलना चाहिए।
आगामी विधानसभा चुनावों पर इसका सीधा असर
साल 2027 में देश के सात प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में मार्च से पहले चुनाव होंगे। उत्तर प्रदेश में मई और गुजरात तथा हिमाचल प्रदेश में दिसंबर से पहले मतदान संपन्न कराए जाने की उम्मीद है।
उत्तर प्रदेश, गुजरात और गोवा में यह प्रक्रिया पहले ही पूरी की जा चुकी है। हिमाचल प्रदेश में जनगणना के बाद इसे लागू किया जाएगा। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों में दूसरे फेज के तहत करोड़ों लोगों का वेरिफिकेशन पहले ही हो चुका है।
कर्नाटक, तेलंगाना और पूर्वोत्तर के राज्यों में साल 2028 में विधानसभा चुनाव होने हैं। वहीं ओडिशा, आंध्र प्रदेश और झारखंड में साल 2029 में चुनाव होंगे। चुनाव आयोग हर राज्य में मतदान की तारीखों से ठीक पहले शुद्ध वोटर लिस्ट तैयार करना चाहता है।
असम में क्यों लागू की गई अलग व्यवस्था
चुनाव आयोग ने असम में पूर्ण एसआईआर के बजाय केवल स्पेशल रिवीजन यानी एसआर का रास्ता चुना। वहां राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी की प्रक्रिया पहले से चल रही है। गहन जांच से एनआरसी और वोटर लिस्ट के डेटा में कानूनी टकराव हो सकता था।
असम में किसी भी नए सामाजिक असंतोष और विवाद से बचने के लिए यह कदम उठाया गया। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में भी चुनावों से ठीक पहले नई लिस्ट जारी हुई थी। बिहार में भी चुनाव की घोषणा से पहले यह काम पूरा किया गया था।
एसआईआर के बाद राजनीतिक दलों का गणित
हाल के चुनावों में एसआईआर प्रक्रिया के बाद राजनीतिक समीकरणों में काफी बदलाव देखा गया है। कई राज्यों में भारतीय जनता पार्टी ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की। हालांकि, वोट शेयर के मामले में पार्टी को बहुत बड़ा उछाल देखने को नहीं मिला।
असम और बिहार में गठबंधन सहयोगियों के कारण एनडीए का वोट प्रतिशत मजबूत हुआ था। दूसरी तरफ, दक्षिण भारत के राज्यों जैसे तमिलनाडु और केरल में प्रमुख दलों के वोट शेयर में गिरावट दर्ज की गई। शुद्ध वोटर लिस्ट से चुनाव परिणाम निष्पक्ष होते हैं।
Author: Harikarishan Sharma

