Health: आमतौर पर किसी भी गंभीर बीमारी से बचने के लिए वैक्सीन हमेशा बीमारी होने से पहले ही लगाई जाती है। हालांकि, रेबीज एक ऐसी अनोखी और बेहद खतरनाक बीमारी है, जिसकी वैक्सीन हमेशा कुत्ता या कोई अन्य संक्रमित जानवर काटने के बाद ही दी जाती है।
एम्स नई दिल्ली के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. राहुल चावला के अनुसार, रेबीज का वायरस स्वभाव में बेहद धीमा होता है। जब कोई संक्रमित कुत्ता काटता है, तो उसकी लार से वायरस घाव में प्रवेश करता है। इसके बाद यह मांसपेशियों से होते हुए नसों के जरिए रीढ़ की हड्डी और दिमाग की तरफ बढ़ता है।
यह वायरस जब तक दिमाग तक नहीं पहुंचता, तब तक शरीर में इसके लक्षण दिखाई नहीं देते। एक बार दिमाग में पहुंचने के बाद यह ब्रेनस्टेम को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसके बाद होने वाले एन्सेफलाइटिस का दुनिया में कोई इलाज नहीं है और इसमें मृत्यु दर लगभग 100% होती है।
दिमाग तक पहुंचने से पहले का कीमती समय
राहत की बात यह है कि रेबीज वायरस को घाव की जगह से दिमाग तक का सफर तय करने में कुछ हफ्तों से लेकर कई महीनों (औसतन 2 से 3 महीने) का लंबा समय लगता है। वायरस के दिमाग तक पहुंचने से पहले का यह समय मरीज की जान बचाने के लिए सबसे कीमती होता है।
इस बीच यदि मरीज को तुरंत रेबीज की वैक्सीन दे दी जाए, तो हमारा इम्यून सिस्टम वायरस से लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाता है। वैक्सीन शरीर में तेजी से एंटीबॉडी बनाती है, जो वायरस को दिमाग तक पहुंचने से पहले ही रास्ते में पूरी तरह खत्म कर देती है।
गहरे घाव होने पर रेडीमेड एंटीबॉडी की जरूरत
अगर कुत्ते ने बहुत बुरी तरह काटा है और घाव काफी ज्यादा गहरा है, तो शरीर में वायरस की मात्रा बहुत अधिक हो सकती है। ऐसी आपातकालीन स्थिति में वायरस तेजी से दिमाग की तरफ भागता है और वहां केवल रेबीज की साधारण वैक्सीन पूरी तरह असरदार नहीं रह जाती है।
ऐसे गंभीर मामलों में डॉक्टरों द्वारा वैक्सीन के साथ-साथ ‘रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन’ का इंजेक्शन भी दिया जाता है। यह एक प्रकार की रेडीमेड एंटीबॉडी होती है। जब तक शरीर में वैक्सीन अपनी एंटीबॉडी बनाना शुरू करती है, तब तक यह इम्युनोग्लोबुलिन वायरस को रोककर तुरंत सुरक्षा देता है।
कैंसर के इलाज में जीनोमिक टेस्ट की बड़ी खोज
दूसरी ओर, ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में भी जीनोमिक टेस्टिंग (OPTIMA Trial) की मदद से डॉक्टरों को बड़ी सफलता मिली है। यह आधुनिक टेस्ट कैंसर सेल्स के जीन की एक्टिविटी का एनालिसिस करता है। इससे यह सटीक पता चल जाता है कि किस मरीज को कीमोथेरेपी की जरूरत है और किसे नहीं।
इस टेस्ट के जरिए कम जोखिम वाले ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों को अनावश्यक कीमोथेरेपी के दर्द और बाल झड़ने जैसे खतरनाक साइड इफेक्ट्स से आसानी से बचाया जा सकता है। अब मेडिकल साइंस में कैंसर का इलाज सिर्फ उसके प्रकार से नहीं, बल्कि मरीज की असल स्थिति देखकर तय होता है।
Author: Asha Thakur


