Uttar Pradesh News: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में पुलिस की मनमानी पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने एक नागरिक को आठ दिनों तक अवैध पुलिस कस्टडी में रखने के मामले को अत्यंत गंभीर माना। माननीय कोर्ट ने सख्त आदेश जारी करते हुए राज्य सरकार पर दो लाख रुपये का भारी जुर्माना लगाया है।
हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि पीड़ित को मुआवजे की यह राशि छह हफ्ते के भीतर मिल जानी चाहिए। कोर्ट ने इस गंभीर मामले में लापरवाही बरतने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ तुरंत जांच शुरू करने के निर्देश भी दिए हैं। इस कड़े फैसले से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है।
प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट के सिस्टम पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी
माननीय अदालत ने यह ऐतिहासिक फैसला प्रयागराज के स्थानीय निवासी मंसूर अहमद की याचिका पर दिया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि विभागीय जांच पूरी होने के बाद यह राशि बारा क्षेत्र के सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) से वसूली जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने पुलिस कमिश्नरेट की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
जस्टिस ने टिप्पणी की कि कमिश्नरेट सिस्टम में पुलिस कमिश्नर को मजिस्ट्रेट की शक्तियां मिलना अब बड़ी चिंता का विषय बन गया है। कुछ मामलों में पुलिस इन प्रशासनिक अधिकारों का सरेआम दुरुपयोग कर रही है। हाई कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस कमिश्नरेट के एक पुराने मामले का हवाला देकर पूरी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा किया।
थाने में मारपीट और गंभीर प्रताड़ना का सनसनीखेज आरोप
पीड़ित परिवार के आरोपों के अनुसार थाना प्रभारी कृष्ण मोहन सिंह दो कांस्टेबलों के साथ मंसूर अहमद के घर में घुसे थे। पुलिस उन्हें जबरन उठाकर थाने ले गई और आठ दिनों तक बंद रखा। परिजनों का आरोप है कि कस्टडी के दौरान मंसूर के साथ बेरहमी से मारपीट की गई, जिससे उनकी तबीयत बिगड़ गई।
परिजनों ने इस तानाशाही के खिलाफ पुलिस कमिश्नर और सहायक पुलिस आयुक्त से लिखित शिकायत की थी। लेकिन शीर्ष पुलिस अधिकारियों ने इस पर कोई ठोस एक्शन नहीं लिया। पुलिस प्रशासन से कोई मदद न मिलने पर थक-हारकर पीड़ित परिवार ने इंसाफ के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
पुलिस के दावों की खुली पोल, नहीं मिला कोई सबूत
अदालत में पुलिस ने अपना बचाव करते हुए दलील दी कि उन्होंने शांति भंग की आशंका के तहत यह कानूनी कार्रवाई की थी। पुलिस का कहना था कि जब किसी मामले में आरोपी बेल बांड या पर्सनल मुचलका भरने से साफ इनकार कर देता है, तब उसे अनिवार्य रूप से ज्यूडिशियल कस्टडी में भेजा जाता है।
हालांकि हाई कोर्ट ने जब केस डायरी और सरकारी रिकॉर्ड की बारिकी से जांच की, तो पुलिस के दावे पूरी तरह झूठे निकले। कोर्ट को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे साबित हो कि मंसूर ने मुचलका भरने से मना किया था। आखिरकार कोर्ट ने प्रयागराज पुलिस को जांच के साथ तुरंत मुआवजा देने का आदेश दिया।
Reported By: Ajay Mishra


