जमशेदपुर में कभी भी घट सकता है दिल्ली जैसा दर्दनाक बेसमेंट हादसा, बिना फायर एनओसी के चल रहा मौत का धंधा

Jharkhand News: जमशेदपुर के बाजारों में बेसमेंट अब पार्किंग या स्टोरेज तक सीमित नहीं रह गए हैं। शहर में नियमों को ताक पर रखकर बनाए गए सैकड़ों बेसमेंट लोगों के लिए टाइम बम साबित हो रहे हैं। इन तंग भूमिगत परिसरों में बिना किसी सुरक्षा मानकों के धड़ल्ले से कोचिंग सेंटर, रेस्टोरेंट और दुकानें चलाई जा रही हैं।

झारखंड डेवलपमेंट अथॉरिटी और नगर निगम के नियमों के मुताबिक बेसमेंट का उपयोग केवल पार्किंग, स्टोरेज या उपयोगिता सेवाओं के लिए ही वैध है। इसके बावजूद शहर के मेन रोड, साकची बाजार, बिस्टुपुर, आदित्यपुर, जुगसलाई, मानगो और डिमना जैसे प्रमुख व्यापारिक इलाकों में नियमों का खुला उल्लंघन धड़ल्ले से जारी है।

नक्शे में पार्किंग दिखाकर जमीन पर अवैध कारोबार

शहर में बड़ी संख्या में ऐसी बिल्डिंग हैं जिनका नक्शा सिर्फ पार्किंग बेसमेंट के नाम पर पास कराया गया था। बाद में मकान मालिकों ने वहां अवैध रूप से शटर लगाकर दुकानें खोल दीं। बिल्डरों को इससे मोटी अतिरिक्त कमाई हो रही है। ऊपर की मंजिल अलग किराए पर और बेसमेंट अलग किराए पर दिया जा रहा है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर निगम के अधिकारी नक्शे और जमीन की वास्तविक स्थिति का मिलान करने तक नहीं आते। राष्ट्रीय भवन संहिता के तहत 300 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र वाले बेसमेंट में कम से कम दो इमरजेंसी एग्जिट अनिवार्य हैं। लेकिन शहर के अधिकांश बेसमेंट में केवल एक ही संकरा रास्ता है।

बिना फायर सेफ्टी और वेंटिलेशन के बड़ा खतरा

राज्य अग्निशमन विभाग के नियमों के अनुसार सभी व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए फायर एनओसी जरूरी है। लेकिन शहर के अधिकांश बेसमेंट में न तो स्प्रिंकलर लगे हैं और न ही इमरजेंसी एग्जिट मौजूद हैं। आग लगने की स्थिति में एकमात्र निकास द्वार धुएं और लपटों से भर जाएगा, जिससे दम घुटने का खतरा बढ़ेगा।

जुलाई 2024 में दिल्ली के राजेंद्र नगर स्थित एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भरने से तीन छात्रों की मौत हो गई थी। उस हादसे के बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त टिप्पणी की थी। इसके बावजूद जमशेदपुर में स्थिति जस की तस बनी हुई है। प्रशासन की लचर नीति के कारण कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिख रही।

डेढ़ दशक पुरानी समस्या पर अधिकारी मौन

जमशेदपुर में बेसमेंट के अवैध उपयोग का यह मामला करीब डेढ़ दशक पुराना है। वर्ष 2010 के बाद शहर में कमर्शियल गतिविधियां बढ़ीं और बेसमेंट को किराए पर देने का चलन शुरू हुआ। वर्ष 2015-16 में नगर निगम ने कुछ नोटिस जारी किए थे, लेकिन राजनीतिक दबाव में कार्रवाई अधूरी रह गई।

वर्ष 2019 में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के दौरान भी इस गंभीर मुद्दे पर लंबी चर्चा हुई थी। मगर आज तक जमीनी स्तर पर कोई ठोस बदलाव नहीं हुआ। स्थानीय छात्रों और ग्राहकों का कहना है कि वे डर के साए में यहां आते हैं। जब तक प्रशासन सख्त एक्शन नहीं लेगा, तब तक यह खतरनाक खेल बंद नहीं होगा।

Author: Rohit Mahato

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