New Delhi News: विशेषज्ञों का मानना है कि भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की रेस में वैश्विक शक्ति बनने के लिए पूरी तरह तैयार है। हालांकि हम इस दौड़ में थोड़ी देर से शामिल हुए हैं, लेकिन युवाओं की विशाल संख्या, प्रचुर डेटा और तकनीकी बुद्धिमत्ता भारत को अमेरिका और चीन के बराबर ही नहीं, बल्कि उनसे आगे ले जाने का दम रखती है। भारत अब केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि भविष्य का बड़ा समाधान प्रदाता बनने की राह पर है।
एआई और रोबोटिक्स में शोध पर जोर
दैनिक जागरण द्वारा आयोजित एक विशेष चर्चा में विशेषज्ञों ने भारत के भविष्य पर मंथन किया। रोबोटिक्स कंपनी ‘एडवर्ब’ के सह-संस्थापक बीर सिंह ने स्पष्ट किया कि भारत अभी चीन से पीछे जरूर है, लेकिन हमने सही दिशा में कदम उठा लिए हैं। उन्होंने जोर दिया कि भारत को अब केवल आईटी सर्विस सेक्टर तक सीमित न रहकर शोध और उत्पाद विकास (प्रोडक्ट डेवलपमेंट) पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
एआई से नौकरियों के खतरे पर बीर सिंह ने स्पष्ट किया कि रोजगार खत्म नहीं होंगे, बल्कि उनका स्वरूप बदलेगा। भविष्य ‘ह्यूमन-रोबोट कोलैबोरेशन’ का है, जहाँ कठिन और जोखिम भरे काम मशीनें करेंगी और मनुष्य अपनी रचनात्मकता और बुद्धिमत्ता का उपयोग करेंगे। भारत के पास डेटा एकत्र करने की जो क्षमता है, वह एआई के विकास में एक बड़ा ‘गेम चेंजर’ साबित होगी।
कौशल विकास और भविष्य की चुनौतियां
नैसकाम की प्रियंका बिष्ट ने कहा कि अमेरिका और चीन ने कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में सालों पहले निवेश किया था, लेकिन भारत अब एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में बढ़ता निवेश भारत को ग्लोबल लीडर बनाएगा। बिष्ट ने स्वीकार किया कि कार्यबल में नई तकनीकों को अपनाने को लेकर झिझक है, लेकिन इसे ‘रिस्किलिंग’ (कौशल को फिर से सीखना) से दूर किया जा रहा है।
सरकार और नैसकाम के साझा प्रयास ‘फ्यूचर स्किल्स प्राइम’ के जरिए एआई, साइबर सिक्योरिटी और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे विषयों पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ये कोर्स नई पीढ़ी को वैश्विक मानकों के अनुरूप तैयार करने में मदद कर रहे हैं। युवाओं को आधुनिक तकनीकों के प्रति जागरूक करना अब एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बन चुकी है।
शिक्षा प्रणाली में बदलाव और उद्योग की मांग
डीटीयू के विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल सिंह परिहार ने कहा कि वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को डिग्री केंद्रित होने के बजाय ‘आजीवन सीखने’ (लाइफ-लॉन्ग लर्निंग) की ओर बढ़ना होगा। उद्योगों को अब ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो केवल थ्योरी नहीं, बल्कि समस्याओं का समाधान (प्रॉब्लम सॉल्विंग) करना जानते हों। विश्वविद्यालय अब इंडस्ट्री के साथ मिलकर अपने पाठ्यक्रम और लैब्स को अपडेट कर रहे हैं।
स्कूल स्तर पर एआई पढ़ाने का उद्देश्य बच्चों में शुरुआती दौर से ही तार्किक सोच विकसित करना है। डॉ. परिहार ने स्पष्ट किया कि एआई कोई जादुई शक्ति नहीं, बल्कि डेटा और एल्गोरिदम का एक तार्किक खेल है। गणित और एल्गोरिदम में भारत की पुरानी धाक है, जिसे एआई के युग में एक नई ऊंचाई पर ले जाने की पूरी तैयारी है।
Author: Gaurav Malhotra

