Varanasi News: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में इतिहास की परीक्षा के दौरान एक अनोखा विवाद सामने आया है। चतुर्थ सेमेस्टर के प्रश्नपत्र में ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को लेकर पूछे गए एक गंभीर सवाल पर सोशल मीडिया और मीडिया में तीखी बहस छिड़ गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पूरे मामले पर तुरंत अपनी आधिकारिक सफाई पेश की है।
बीएचयू प्रशासन ने दी पाठ्यक्रम पर बड़ी सफाई
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार यह विवादित विषय एमए इतिहास के नियमित पाठ्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ‘वुमेन इन मॉडर्न इंडियन हिस्ट्री’ पेपर के तहत छात्रों से यह सवाल पूछा गया था। प्रशासन का कहना है कि विद्यार्थियों के समग्र ज्ञान और विश्लेषणात्मक क्षमता को बढ़ाने के लिए ऐसे सवाल बेहद जरूरी हैं।
संस्थान ने स्पष्ट किया कि पाठ्यक्रम की किसी भी अवधारणा पर अकादमिक बहस होना पूरी तरह स्वाभाविक है। छात्रों को विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने के लिए विशेष संदर्भ पुस्तकें भी सुझाई जाती हैं। परीक्षा में पूछे गए इस प्रश्न को केवल शैक्षणिक और अकादमिक संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए।
प्रख्यात इतिहासकारों की पुस्तकों का मिला हवाला
इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर घनश्याम ने बताया कि प्रसिद्ध नारीवादी विद्वान उमा चक्रवर्ती की पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल हैं। उनकी पुस्तकें महिला अध्ययन विभागों में संदर्भ सामग्री के रूप में पढ़ाई जाती हैं। इन किताबों में प्राचीन भारत में जाति व्यवस्था और महिलाओं की अधीनता के अंतर्संबंधों को समझाया गया है।
विभाग के शिक्षकों के अनुसार इन पाठ्य सामग्रियों का उद्देश्य किसी भी जाति या वर्ग को ठेस पहुंचाना नहीं है। इसका एकमात्र उद्देश्य विद्यार्थियों को प्राचीन सामाजिक व्यवस्था और उसके ऐतिहासिक पहलुओं की सही जानकारी देना है। इतिहास की इन कड़ियों से सीखकर भविष्य की व्यवस्था को अधिक बेहतर और मजबूत बनाया जा सकता है।
ज्ञान के शब्दों को जाति से जोड़ना गलत
इतिहास विभाग की डॉक्टर जय लक्ष्मी ने इस विषय पर एक बेहद महत्वपूर्ण और अलग नजरिया साझा किया है। उनके अनुसार ज्ञान के शब्दों को कभी भी जाति, धर्म या संकीर्ण वर्ग से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। इतिहास में कई जगहों पर ब्राह्मण शब्द का प्रयोग ज्ञान के प्रतीक के रूप में किया गया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्राह्मण का मूल अर्थ वह व्यक्ति है जिसके भीतर उच्च स्तर का ब्राह्मणत्व और अथाह ज्ञान हो। इतिहास की पुस्तकों में इस तरह के शब्दों का उल्लेख केवल संदर्भ के लिए होता है। इसका वास्तविक तात्पर्य कभी भी आधुनिक समाज की किसी विशेष जाति को इंगित करना नहीं होता है।
Author: Ajay Mishra


