Delhi News: मई का महीना आते ही हर साल देश में भीषण गर्मी को लेकर हाहाकार मच जाता है। चिलचिलाती धूप और आसमान से बरसती आग के बीच लोग अक्सर यह सवाल पूछते हैं कि क्या वाकई हर साल गर्मी का प्रकोप बढ़ता जा रहा है या फिर इंसानों की शारीरिक सहनशक्ति घट रही है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक बीते सोमवार को देश की राजधानी दिल्ली में अधिकतम तापमान 43.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया था। इस तपिश ने दिल्लीवासियों को बेहाल कर दिया। इससे पहले साल 2012 में भी ठीक इतना ही अधिकतम तापमान रिकॉर्ड किया गया था।
मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि नौतपा के इस चालू सीजन में दिल्ली और एनसीआर के इलाकों में पारा 43 से 44 डिग्री सेल्सियस के बीच ही बना रहेगा। आसमान में न तो काले बादल दिख रहे हैं और न ही ठंडी हवाएं चल रही हैं। इस सूखे मौसम से हाहाकार मचा है।
लोग गर्मी से बचने के लिए दिन-रात एयर कंडीशनर (AC) चला रहे हैं। हालांकि प्राकृतिक ठंडी हवा और बारिश के आगे ये कृत्रिम साधन पूरी तरह फेल साबित होते हैं। आजकल महानगरों से लेकर छोटे कस्बों तक के लोग आधुनिक सुख-सुविधाओं को अपनी रोजमर्रा की जीवन शैली का हिस्सा बना चुके हैं।
पुराने मौसम रिकॉर्ड खंगालने पर सामने आया बेहद चौंकाने वाला सच
अगर हम मौसम विभाग का पुराना रिकॉर्ड ध्यान से खंगालें तो एक अलग ही सच्चाई सामने आती है। हर साल मई से जुलाई के बीच दर्ज होने वाले अधिकतम तापमान का डेटा लगभग एक समान ही मिलता है। इसके बावजूद इंसानी शरीर की बेचैनी साल दर साल तेजी से बढ़ रही है।
पब्लिक को हमेशा यही महसूस होता है कि पिछले साल के मुकाबले इस बार ज्यादा गर्मी पड़ रही है। दिल्ली के पुराने तापमान पर नजर डालें तो साल 1989 में 4 जून के दिन राजधानी का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। यह आंकड़ा आज के मुकाबले बहुत अधिक था।
आजकल शहरों के अंदर सघन कॉलोनियां बन चुकी हैं। ऐसे में जरा सी देर के लिए भी बत्ती गुल होने पर लोगों का तनाव सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। एक दौर था जब दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी अधिकांश मध्यमवर्गीय परिवारों के घरों में एयर कंडीशनर नहीं होते थे।
उस समय आम लोग डीटीसी की साधारण बसों में सफर करते थे और घरों में केवल कूलर की हवा लेते थे। यह दिल्ली में मेट्रो रेल नेटवर्क के फैलने से पहले की बात है। आज के समय में लोगों को घर, कार, ऑफिस और मेट्रो तक में हर जगह एसी की लत लग चुकी है।
लगातार कृत्रिम ठंडी हवा में रहने से मानव स्वास्थ्य पर पड़ा बुरा असर
हर जगह एसी में रहने की इस आधुनिक आदत की वजह से अब जरा सी धूप भी शरीर को काटने लगती है। गर्म हवा के थपेड़े लगते ही इंसानी शरीर उबलने लगता है। यह बदली हुई आरामदायक लाइफस्टाइल अब हमारी स्वाभाविक सहनशक्ति और इम्यूनिटी को बहुत ज्यादा प्रभावित कर रही है।
बेशक एयर कंडीशनर आज के कामकाजी दौर में दफ्तरों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए बेहद जरूरी बन चुका है। अत्यधिक काम के दबाव के बीच माहौल को कूल रखना मजबूरी है। लेकिन लगातार कृत्रिम वातावरण में रहने से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता लगातार कमजोर होती जा रही है।
प्राकृतिक धूप और ताजी हवा हमारे शरीर के आंतरिक इम्यून सिस्टम को हमेशा मजबूत बनाए रखती है। गर्मी से निपटने के पारंपरिक उपायों को छोड़कर हम मशीनों पर निर्भर हो गए हैं। इसका सीधा और घातक असर हमारी त्वचा, हड्डियों, मांसपेशियों और बालों पर साफ दिख रहा है।
ये आधुनिक उपकरण हमारे बाहरी पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। यही वजह है कि आज मई और जून के महीनों में तापमान भले ही पिछले सालों के आसपास ही दर्ज हो रहा हो, लेकिन वह आम इंसानों के लिए पूरी तरह बर्दाश्त से बाहर होता जा रहा है।
Author: Shilla Bhatia

