खतरे में दुनिया की झीलें! ग्लोबल वार्मिंग से खत्म हो रही प्राकृतिक सांसें, क्या आएगा महासंकट?

World News: जलवायु परिवर्तन के कारण झीलों की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। बढ़ते तापमान और छोटी होती सर्दियों से झीलों में डिनाइट्रिफिकेशन की प्रक्रिया आधी रह गई है। इससे झीलों की नाइट्रोजन सोखने की क्षमता काफी कमजोर हो गई है, जिससे एक बड़े पर्यावरणीय संकट का खतरा पैदा हो गया है।

लगातार बढ़ता तापमान झीलों के पानी को अलग-अलग परतों में बांट रहा है। सतह और गहराई वाले पानी के बीच की परतें लंबे समय तक अलग रहती हैं। इस वजह से गहरे पानी में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरने लगता है। ऑक्सीजन कम होने से पानी के भीतर होने वाली जरूरी जैविक प्रक्रियाएं भी बाधित हो जाती हैं।

झीलों में मौजूद सूक्ष्मजीव एक प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करते हैं। ये जीव हानिकारक नाइट्रोजन यौगिकों को तोड़कर नाइट्रोजन गैस में बदल देते हैं। इसके बाद यह गैस सुरक्षित तरीके से वायुमंडल में मिल जाती है। यह पूरी प्रक्रिया जैवमंडल से अतिरिक्त नाइट्रोजन को हटाने में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और प्रभावी भूमिका निभाती है।

झीलों की सफाई में मौसम की भूमिका

यह चौंकाने वाला खुलासा नेचर माइक्रोबायोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक नई रिसर्च में हुआ है। स्विट्जरलैंड के बासेल विश्वविद्यालय और ईवाग संस्थान के शोधकर्ताओं ने यह विस्तृत अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों की टीम ने स्विट्जरलैंड के लुसेर्न झील क्षेत्र में स्थित लेक बाल्डेग से पानी के कई अहम नमूने एकत्र किए थे।

शोधकर्ताओं ने बताया कि नाइट्रोजन हटाने की प्राकृतिक प्रक्रिया मौसमी बदलावों से सीधे तौर पर जुड़ी है। सर्दियों के मौसम में लेक बाल्डेग की तीनों परतें आपस में पूरी तरह मिल जाती हैं। इसमें गर्म सतह, संक्रमण क्षेत्र और गहराई का बेहद ठंडा पानी शामिल है। यह मिलावट पानी की सफाई के लिए बहुत जरूरी है।

जब सर्दियों में पानी अच्छी तरह से मिलता है, तो नाइट्रोजन हटाने की सक्रियता लगभग पचास प्रतिशत तक बढ़ जाती है। बासेल विश्वविद्यालय के मुख्य शोधकर्ता कैमरन कॉलबेक के अनुसार, जलवायु परिवर्तन इस अहम प्राकृतिक चक्र को तोड़ रहा है। तेज गर्मियों के कारण सर्दियों का मिश्रण चरण घटकर केवल सत्ताईस दिन तक रह सकता है।

भविष्य में मंडराता गंभीर खतरा

यदि झीलों में नाइट्रोजन सोखने की यह प्रक्रिया धीमी पड़ती है, तो इसके परिणाम बेहद भयानक हो सकते हैं। अतिरिक्त नाइट्रोजन नदियों के रास्ते सीधे महासागरों में पहुंचेगा। इससे तटीय क्षेत्रों में शैवाल बहुत तेजी से फैलेंगे। इसके कारण समुद्रों में ऑक्सीजन की कमी वाले खतरनाक मृत क्षेत्र बन जाएंगे, जो समुद्री जीवों के लिए जानलेवा होंगे।

वैज्ञानिकों ने झील में इस प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को मापने के लिए दो अलग तरीकों का इस्तेमाल किया। सबसे पहले टीम ने तलछट के नमूनों में दुर्लभ आइसोटोप का प्रयोग किया। इस आधुनिक तकनीक से यह सटीक पता चला कि कितना नाइट्रोजन वास्तव में गैस में बदला है। इसके बाद एक विशेष मॉडल भी तैयार किया गया।

Author: Pallavi Sharma

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