Ranchi News: झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स में ओपीडी मरीजों को मुफ्त दवा देने की सरकारी योजना अधर में लटक गई है। अस्पताल प्रशासन की सुस्त रेट कांट्रैक्ट प्रक्रिया के कारण हजारों लाचार मरीजों का इलाज प्रभावित हो रहा है। इसके चलते काउंटर से मुफ्त मेडिसिन मिलने की उम्मीद टूट चुकी है।
अस्पताल की सेंट्रल फार्मेसी में दवाओं का भारी टोटा
अस्पताल की मुख्य सेंट्रल फार्मेसी में इस समय आवश्यक दवाओं का सिर्फ 20 प्रतिशत स्टॉक ही बचा है। इसके उलट नजदीकी सदर अस्पताल परिसर की फार्मेसी में करीब 80 प्रतिशत दवाएं आसानी से मिल रही हैं। रिम्स में समय पर सरकारी खरीद और सप्लाई मैनेजमेंट न होने से यह गंभीर संकट पैदा हुआ है।
अस्पताल के डॉक्टर ओपीडी में रोजाना जो दवाएं पर्चे पर लिख रहे हैं, वे काउंटर पर मिल ही नहीं रही हैं। मुफ्त दवा काउंटर पर पहुंचने वाले लाचार मरीजों को कर्मचारी बाहर के प्राइवेट मेडिकल स्टोर से महंगी दवा खरीदने की पर्ची थमा रहे हैं। इससे मरीजों की जेब पर भारी आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।
कैंसर और हार्ट के मरीजों की बढ़ी परेशानी
दवाओं की इस गंभीर कमी का सबसे बुरा असर कैंसर, कार्डियोलॉजी और डेंटल विभागों में दिख रहा है। इन गंभीर रोगों के मरीजों के लिए जरूरी जीवन रक्षक मेडिसिन स्टॉक से बिल्कुल नदारद हैं। यहां तक कि डेंटल कॉलेज की फार्मेसी में सामान्य पेन किलर दवाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।
दांतों के गंभीर संक्रमण और असहनीय दर्द से तड़प रहे मरीज भी बाहर से महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर हैं। इसी तरह दिल की बीमारी और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों से जूझ रहे बेहद गरीब परिवारों पर इलाज का अतिरिक्त खर्च अचानक कई गुना ज्यादा बढ़ गया है।
अस्पताल में सिर्फ गंभीर रोगों की ही नहीं, बल्कि बेहद सामान्य और आवश्यक दवाओं का भी बड़ा अकाल पड़ा हुआ है। ओपीडी में विटामिन सप्लीमेंट, एलर्जी की गोलियां, गैस-एसिडिटी की दवाएं और फंगल इन्फेक्शन की जरूरी क्रीम तक मरीजों को काउंटर से नहीं मिल पा रही हैं।
इसके अलावा सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक एमोक्सिक्लेव-625 और सामान्य खांसी का सिरप भी अस्पताल में पूरी तरह आउट ऑफ स्टॉक हो चुका है। सूत्रों के मुताबिक करीब 100 से अधिक जीवन रक्षक दवाएं इस समय अस्पताल की किसी भी फार्मेसी में मौजूद नहीं हैं।
पांच राज्यों से आने वाले मरीजों का बढ़ा बजट
रिम्स के ओपीडी में हर दिन करीब 2800 नए और पुराने मरीज अपना इलाज करवाने पहुंचते हैं। इनमें झारखंड के अलावा पड़ोसी राज्य बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती इलाकों के मरीज भी शामिल हैं। ये सभी गरीब लोग मुफ्त इलाज की आस में यहां आते हैं।
सरकारी दावों के उलट अस्पताल में दवाएं न मिलने से इन मरीजों को प्राइवेट दुकानों पर भारी रकम चुकानी पड़ रही है। कई लाचार मरीजों ने बताया कि डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवाओं को बाहर से खरीदने में उनके सैकड़ों और हजारों रुपये रोज बर्बाद हो रहे हैं।
आईएमए के प्रदेश सचिव डॉ. प्रदीप कुमार सिंह ने इस गंभीर अव्यवस्था पर कड़ी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि अस्पताल में दवाओं की कमी से सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर जनता का भरोसा टूटेगा। कई गरीब मरीज पैसे की तंगी के कारण पूरी दवा नहीं खरीद पाते, जिससे उनकी बीमारी और बढ़ जाएगी।
रिम्स के जनसंपर्क पदाधिकारी डॉ. शिशिर कुमार ने माना कि दवाओं का रेट कांट्रैक्ट अभी तक फाइनल नहीं हो पाया है। इसकी कानूनी प्रक्रिया अभी चल रही है। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस प्रक्रिया के पूरे होते ही कैंसर और कार्डियोलॉजी समेत सभी जरूरी विभागों में दवाओं की सप्लाई तुरंत बहाल कर दी जाएगी।
Author: Rohit Mahato


