माइक्रोबायोलॉजी की पढ़ाई छोड़ श्रेया ने शुरू किया अनोखा बिजनेस, नासा की तकनीक से मांएं विदेश भेज रहीं ‘घी वाला प्यार’

Mumbai News: जब श्रेया शाह ने मुंबई के सोफिया कॉलेज से माइक्रोबायोलॉजी में बीएससी की पढ़ाई पूरी की थी, तब उन्होंने यह कभी नहीं सोचा होगा कि बैक्टीरिया की ग्रोथ और माइक्रोबियल अरेस्ट से जुड़ी उनकी सीख एक बेहद कामयाब और अनोखे बिजनेस की मजबूत नींव बनेगी।

आज श्रेया शाह अपना पूरा दिन एक ऐसे अनोखे काम में बिताती हैं, जिससे उनके कॉलेज के प्रोफेसर और भारतीय माताएं दोनों बेहद खुश हैं। वह विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट घरेलू खानों को डिहाइड्रेट (सुखाकर पानी निकालना) करने का एक बड़ा व्यावसायिक केंद्र चला रही हैं।

श्रेया शाह आज देश में प्रोफेशनल फूड डिहाइड्रेटर्स की तेजी से बढ़ती कॉटेज इंडस्ट्री का एक बेहद अहम हिस्सा बन चुकी हैं। यह खास इंडस्ट्री विदेशों में पढ़ रहे और नौकरी कर रहे उन लाखों प्रवासियों की जरूरतों को पूरा करती है, जो घर के खाने को तरसते हैं।

नासा की फ्रीज-ड्राइंग तकनीक से भोजन हुआ कुरकुरा

अब इस काम के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) द्वारा विकसित ‘फ्रीज-ड्राइंग’ की आधुनिक और महंगी तकनीक भी भारत में आसानी से उपलब्ध है। इसके जरिए प्रोफेशनल लोग दाल, करी, खिचड़ी और मखनी जैसे व्यंजनों को कुरकुरे व सूखे रूप में बदल रहे हैं।

पूरी तरह वैक्यूम-सील्ड होने के कारण भोजन के ये पैकेट विदेशों में यात्रा के दौरान आसानी से ले जाए जा सकते हैं। ये इंटरनेशनल एयरपोर्ट्स पर कस्टम्स चेकिंग से भी आसानी से निकल जाते हैं। बस एक कप उबलते गर्म पानी से यह दोबारा ताजा हो जाता है।

दुनिया भर के विभिन्न इंटरनेशनल कॉलेज कैंपस में भारतीय छात्रों की लगातार बढ़ती संख्या के साथ-साथ खाने को डिहाइड्रेट और फ्रीज-ड्राई करने का यह डोमेस्टिक बिजनेस भी आज भारत के बड़े महानगरों में बहुत तेजी से पैर पसार रहा है।

14 लाख से अधिक छात्र विदेशों में ले रहे स्वाद

एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, वर्तमान में करीब 14 लाख से अधिक भारतीय छात्र विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं। बिना लहसुन-प्याज या बिना अंडे वाले शुद्ध शाकाहारी भोजन की चिंता में परेशान माताएं अब मुंबई, अहमदाबाद और दिल्ली की छोटी फैक्टरियों में घर का खाना भेजती हैं।

श्रेया शाह बताती हैं कि भोजन में मौजूद नमी की वजह से ही खतरनाक माइक्रोबियल ग्रोथ होती है, जिससे खाना जल्दी खराब होता है। जब हम आधुनिक मशीनों से इसकी पूरी नमी निकाल देते हैं, तो भोजन बिना किसी प्रिजर्वेटिव के एक साल तक चल सकता है।

नवी मुंबई की रहने वाली पारुल पटेल बताती हैं कि उनका बेटा अमेरिका के साउथ कैरोलिना में मेडिकल रेसीडेंसी कर रहा है। वह उसे नियमित रूप से यह खाना भेजती हैं, क्योंकि उस अमेरिकी शहर में लोगों ने कभी भारतीय स्वादों को चखा तक नहीं है।

डिहाइड्रेशन के मुकाबले क्यों बेहतर है फ्रीज-ड्राइंग?

फूड एक्सपर्ट्स के अनुसार, कुछ सब्जियों को डिहाइड्रेट करने पर वे अच्छी नहीं बनतीं। जैसे, आलू को दोबारा पानी में डालने पर उसका टेक्सचर वैसा नहीं रहता। पनीर के क्यूब्स भी चबाने में थोड़े खुरदरे हो जाते हैं, लेकिन पाव भाजी और सांभर हमेशा पसंद किए जाते हैं।

अनुसंधान के मुताबिक, स्वाद, टेक्सचर और न्यूट्रिशन के मामले में सामान्य डिहाइड्रेशन के मुकाबले आधुनिक फ्रीज-ड्राइंग तकनीक को सबसे बेहतर माना जाता है। उदाहरण के लिए, आम के गूदे को डिहाइड्रेट करने पर वह चमड़े जैसी सख्त शीट में बदल जाता है।

दूसरी तरफ, फ्रीज-ड्राइंग से अल्फोंसो आम की जादुई खुशबू पूरी तरह बरकरार रहती है। डिहाइड्रेशन में गर्मी का इस्तेमाल होता है, जबकि फ्रीज-ड्राइड खाने को पहले शून्य से नीचे तापमान पर जमाया जाता है। फिर वैक्यूम चैंबर में बर्फ को सीधे भाप में बदल दिया जाता है।

Rashmi Sharma

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