डायबिटीज पेरेंट्स सावधान! क्या आपके बच्चों को भी है मधुमेह का खतरा? जानें बचाव के अचूक तरीके और डॉक्टरी सलाह

New Delhi News: आधुनिक जीवनशैली और आनुवंशिक कारणों से डायबिटीज अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही है। आजकल हर दूसरे घर में मधुमेह का मरीज मिल जाता है, जिससे बच्चों में भी इस बीमारी का खतरा बढ़ गया है। यदि माता-पिता में से किसी एक को भी डायबिटीज है, तो बच्चों में इसके होने की आशंका काफी प्रबल हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही समय पर सजगता और जीवनशैली में बदलाव से इस गंभीर समस्या को रोका जा सकता है।

क्या माता-पिता से बच्चों में पहुंचता है मधुमेह?

विशेषज्ञों के अनुसार जीन माता-पिता से बच्चों में ट्रांसफर होते हैं, जिन्हें ‘ससेप्टिबिलिटी जीन्स’ कहा जाता है। क्लाउडनाइन अस्पताल के पीडियाट्रिशियन डॉ. अभिषेक चोपड़ा बताते हैं कि डीएनए में मौजूद ये जीन इंसुलिन के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं। हालांकि, जीन का होना बीमारी की गारंटी नहीं है, लेकिन यह जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है। टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून स्थिति है, जबकि टाइप 2 जेनेटिक्स और खराब जीवनशैली का मिला-जुला परिणाम होती है।

टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज का कितना है जोखिम?

आंकड़ों की मानें तो यदि पिता को टाइप 1 डायबिटीज है, तो बच्चे में इसका जोखिम 17 में से 1 होता है। यदि मां 25 वर्ष से कम उम्र की है, तो खतरा 25 में से 1 और अधिक उम्र होने पर 100 में से 1 रह जाता है। टाइप 2 डायबिटीज के मामले में जेनेटिक्स और लाइफस्टाइल को अलग करना मुश्किल होता है। इंसुलिन रेजिस्टेंस और बीटा सेल डिस्फंक्शन इसके मुख्य कारण हैं, जो शरीर में शुगर लेवल को अनियंत्रित कर देते हैं।

बच्चों में दिखने वाले इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

बच्चों में डायबिटीज के लक्षण बहुत तेजी से उभरते हैं, इसलिए पेरेंट्स को सतर्क रहना चाहिए। बहुत ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना और बिना किसी कारण के वजन कम होना इसके प्राथमिक संकेत हैं। इसके अलावा, लगातार थकान महसूस होना, आंखों की रोशनी में बदलाव और गर्दन के आसपास की त्वचा का काला पड़ना भी गंभीर लक्षण हैं। यदि घाव भरने में अधिक समय लग रहा है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

जांच के लिए सही समय और प्रमुख टेस्ट

डॉ. अभिषेक चोपड़ा सलाह देते हैं कि जब बच्चा 10 वर्ष का हो जाए या प्यूबर्टी में प्रवेश करे, तब टेस्ट शुरू करने चाहिए। खासकर ओवरवेट बच्चों के लिए हर तीन साल में चेकअप अनिवार्य है। मुख्य जांचों में एचबीए1सी (HbA1c) टेस्ट शामिल है, जो पिछले 3 महीनों का औसत शुगर बताता है। इसके अलावा फास्टिंग प्लाज्मा ग्लूकोज और ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट के जरिए शरीर की शुगर हैंडल करने की क्षमता का सटीक पता लगाया जाता है।

बचाव के लिए अपनाएं ये प्रभावी तरीके

  1. हेल्दी डाइट: बच्चों को चीनी और प्रोसेस्ड फूड जैसे कोल्ड ड्रिंक्स और पैकेट बंद जूस से दूर रखें। उनके भोजन में फाइबर, हरी सब्जियां और सलाद की मात्रा बढ़ाएं।
  2. स्क्रीन टाइम कम करें: घंटों मोबाइल या टीवी देखने से बच्चे निष्क्रिय हो जाते हैं, जिससे इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ता है। स्क्रीन टाइम कम कर उन्हें सक्रिय बनाएं।
  3. शारीरिक गतिविधि: बच्चों को रोजाना कम से कम 60 मिनट फुटबॉल, स्विमिंग या रनिंग जैसे खेलों के लिए प्रोत्साहित करें। इससे मेटाबॉलिज्म सही रहता है।
  4. नींद और वजन नियंत्रण: सुनिश्चित करें कि बच्चा 8-9 घंटे की गहरी नींद ले। बढ़ता वजन डायबिटीज का सबसे बड़ा कारण है, इसलिए इसे कंट्रोल में रखना बेहद जरूरी है।
  5. नियमित हेल्थ चेकअप: पारिवारिक इतिहास होने पर साल में कम से कम एक बार बच्चे की स्क्रीनिंग जरूर कराएं।
    अभिभावक अपनी आदतों में सुधार कर और बच्चों को शारीरिक रूप से सक्रिय रखकर इस आनुवंशिक खतरे को काफी हद तक टाल सकते हैं। सजगता ही इस बीमारी से बचाव का सबसे बड़ा हथियार है।

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