Shimla News: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने सरकारी विभागों द्वारा कर्मचारियों की पिछली सेवाओं को नजरअंदाज करने पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि सहायता प्राप्त स्कूलों के सरकारी अधिग्रहण के बाद स्टाफ की पिछली सेवा को शून्य मानना पूरी तरह गलत और असंवैधानिक है।
न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता दौलत राम की याचिका को स्वीकार करते हुए यह व्यवस्था दी। कोर्ट ने शिक्षा विभाग को आदेश दिया कि याचिकाकर्ता की 8 मार्च 1997 से दी गई पुरानी सेवाओं को जोड़कर पूर्णकालिक दर्जा दिया जाए।
याचिकाकर्ता की 10 साल की सेवा जोड़ने के निर्देश
अदालत ने नीति के अनुसार सेवाएं नियमित करने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ता ने कोर्ट आने में थोड़ी देरी की थी, इसलिए वित्तीय एरियर केवल याचिका दायर करने की तिथि से 3 वर्ष पहले तक का ही मिलेगा। विभाग ने 1997 से 2007 तक की सेवा जोड़ने से मना किया था।
दौलत राम को 8 मार्च 1997 को अर्की के खड़हट्टी स्थित इंदिरा मिडल स्कूल में पार्ट-टाइम जलरक्षक नियुक्त किया गया था। इस स्कूल को 95 प्रतिशत वित्तीय सहायता मिलती थी। सितंबर 2005 में सरकार ने इस स्कूल का पूरी तरह अधिग्रहण कर लिया था।
जूनियर अधिकारियों का अड़ंगा संविधान का उल्लंघन
फरवरी 2006 में विभाग ने दौलत राम को उसी पद पर रखा, लेकिन उन्हें नया कर्मचारी घोषित कर दिया। हाई कोर्ट ने सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वर्ष 2001 में शिक्षा सचिव स्तर पर नियमितीकरण की सिफारिश हुई थी।
इसके बावजूद जूनियर अधिकारियों द्वारा मामले को अटकाना और बाद में नई भर्ती दिखाना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विक्रम भालचंद्र बनाम गर्ल्स हाई स्कूल मामले की मिसाल भी दी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि सहायता प्राप्त स्कूलों के कर्मियों की स्थिति व्यावहारिक रूप से सरकारी कर्मचारियों के समान होती है। इसलिए किसी भी कर्मचारी को पेंशन और अन्य लाभों से वंचित करने के लिए उनकी पुरानी सेवाओं को काटा नहीं जा सकता है।

