Shimla News: सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार को बड़ी राहत दी है। अदालत ने एमएसपी, कृषि ऋण माफी, फसल बीमा और राज्य किसान आयोग से जुड़े हाईकोर्ट के निर्देश रद्द कर दिए। पीठ ने कहा कि ऐसे फैसले नीति के विषय हैं। इन्हें सरकार और विधायिका ही तय कर सकती है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की पीठ ने हिमाचल सरकार की अपील पर यह फैसला सुनाया। अदालत ने साफ किया कि अदालतें किसानों की परेशानी पर ध्यान दे सकती हैं, लेकिन सरकार को किसी खास नीति के लिए बाध्य नहीं कर सकतीं।
किसान नीतियों पर अदालत ने सीमाएं तय कीं
मामला भारतीय गोवंश रक्षण संवर्धन परिषद की जनहित याचिका से शुरू हुआ था। याचिका में गो संरक्षण, गोशालाओं के निर्माण और बेसहारा पशुओं की समस्या उठाई गई थी। बाद में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने किसानों की समस्याओं को भी शामिल किया और राज्य सरकार को कई निर्देश दिए।
हाईकोर्ट ने सरकार को 107 कृषि जिंसों पर एमएसपी देने पर विचार करने के लिए कहा था। इसके साथ राज्य किसान आयोग बनाने, छोटे और सीमांत किसानों के 50 हजार रुपये तक के कृषि ऋण माफ करने की योजना बनाने और फसल बीमा का दायरा बढ़ाने के निर्देश भी दिए थे।
हाईकोर्ट के किन निर्देशों पर रोक लगी
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि एमएसपी तय करना, वित्तीय सहायता योजना बनाना, आयोग गठित करना और फसल बीमा मॉडल चुनना सरकार का काम है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक संसाधनों का उपयोग कैसे होगा, यह निर्वाचित सरकार तय करती है। अदालत इस जगह नीति निर्माता नहीं बन सकती।
पीठ ने संविधान में शक्तियों के बंटवारे का भी जिक्र किया। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की अपनी-अपनी सीमाएं हैं। कोई भी अंग दूसरे के अधिकार क्षेत्र में अनावश्यक दखल नहीं दे सकता। यही व्यवस्था लोकतांत्रिक संतुलन को बनाए रखती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट किसानों की हालत पर संज्ञान लेने के अधिकार में था। लेकिन राज्य को समयबद्ध तरीके से विशेष नीतियां बनाने के अनिवार्य निर्देश देना संवैधानिक सीमा से बाहर था। अदालत ने इसे नीति और वित्तीय प्राथमिकता से जुड़ा मामला माना।
राज्य सरकार ने अदालत में कहा था कि ऐसे निर्देश लागू करने में बड़े वित्तीय और प्रशासनिक पहलू जुड़े हैं। सरकार ने यह भी बताया कि कई किसान कल्याण योजनाएं पहले से चल रही हैं। अदालत ने इस पक्ष को अहम माना और हाईकोर्ट के व्यापक निर्देशों में हस्तक्षेप किया।
फैसले के बाद हिमाचल सरकार को किसान नीतियों पर अपने स्तर से निर्णय लेने की छूट मिल गई है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने गो संरक्षण और पशु कल्याण से जुड़े पहलुओं पर अलग स्थिति रखी। राज्य में गोवंश संरक्षण से संबंधित कानून बनने के बाद उस हिस्से में विवाद काफी हद तक सीमित रहा।
Author: Sunita Gupta

