Himachal Pradesh में कीटनाशकों का कहर: कैंसर के बढ़ते मामलों ने बढ़ाई चिंता, सेब की फसल बन रही जहर

Himachal Pradesh News: सेब और सब्जियों की खेती ने प्रदेश को ‘फलों का कटोरा’ तो बना दिया, लेकिन इसकी कीमत लोग अपनी जान से चुका रहे हैं। यहां कैंसर के मामले राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। मुख्यमंत्री ने खुद इसके लिए कीटनाशकों को जिम्मेदार ठहराया है।

हर साल विश्व पर्यावरण दिवस पर हम हिमालय की स्वच्छ तस्वीर देखते हैं। लेकिन इस तस्वीर के पीछे एक गहरा संकट छिपा है। Himachal Pradesh की सेब और सब्जी वाली खेती ने राज्य को रासायनिक जाल में फंसा दिया है।

सेब के बागानों में जहर का छिड़काव

कुल्लू के बंजार घाटी के 65 वर्षीय किसान बताते हैं, ‘एक सीजन में मैं दस से बारह बार छिड़काव करता हूं।’ यह कोई अपवाद नहीं है। शिमला और कुल्लू में यह आम बात है। इससे किसान खुद सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

महामारी विज्ञान के अध्ययनों से भयानक सच सामने आया है। किसानों में अत्यधिक थकान, आंखों में जलन और त्वचा रोग आम हो गए हैं। यह अब सिर्फ एक व्यावसायिक जोखिम नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है।

कैंसर की रफ्तार ने बढ़ाई टेंशन

आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं। Himachal Pradesh में देश की दूसरी सबसे अधिक कैंसर दर है। यहां मृत्यु दर 9.5 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत 7.7 प्रतिशत से कहीं अधिक है। सबसे चिंताजनक इसकी बढ़ती रफ्तार है।

प्रदेश में कैंसर के मामले सालाना 2.2 प्रतिशत बढ़ रहे हैं। जबकि पूरे देश में यह वृद्धि दर महज 0.6 प्रतिशत है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सार्वजनिक रूप से इसके लिए कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों को जिम्मेदार ठहराया है।

आईजीएमसी और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय अब इस प्रदूषण की असली सीमा जानने के लिए संयुक्त शोध कर रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि कृषि रसायन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हैं। उन्होंने इसके लिए सख्त कानून की मांग की है।

जहरीला रसायन ‘पैराक्वाट’ बना प्रतीक

पैराक्वाट नाम का कीटनाशक वैश्विक बहस का विषय है। 75 से अधिक देशों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके प्रमुख निर्माता ने भी इसका उत्पादन बंद करने का ऐलान कर दिया है। लेकिन Himachal Pradesh में यह अब भी उपलब्ध है।

इसका असर सिर्फ बीमारियों तक सीमित नहीं है। शिमला मंडल में अकेले पांच सालों में कीटनाशकों से जुड़ी 585 मौतें दर्ज की गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे विषैले कीटनाशकों पर रोक लगाकर इन मौतों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

मिट्टी से लेकर मधुमक्खी तक पर संकट

यह जहर सिर्फ इंसानों को ही नहीं, बल्कि पर्यावरण को भी बर्बाद कर रहा है। Himachal Pradesh उत्तर भारत का ‘जल टॉवर’ है। बारिश का पानी खेतों से जहरीले रसायनों को बहाकर नदियों में पहुंचा रहा है। इससे मिट्टी के लाभकारी सूक्ष्मजीव भी मर रहे हैं।

सबसे बड़ा नुकसान सेब की अर्थव्यवस्था को हो रहा है। कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मधुमक्खियां खत्म हो रही हैं। परागण के लिए किसानों को अब महंगे व्यावसायिक मधुमक्खी बक्से किराए पर लेने पड़ रहे हैं। जो पारिस्थितिकी तंत्र कभी खुद टिकाऊ था, वह अब मानव निर्मित कर पर निर्भर है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ‘सुरक्षित उपयोग’ के निर्देशों से यह संकट नहीं टलेगा। राज्य को सबसे खतरनाक कीटनाशकों पर तुरंत प्रतिबंध लगाना चाहिए। खासकर उन पर जिनका कोई एंटीडॉट नहीं है। साथ ही किसानों को एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) जैसे टिकाऊ विकल्प देने होंगे।

प्रदेश की प्राकृतिक खेती योजना (PKYKY) तभी सफल हो सकती है, जब मिट्टी पहले से जहरीली न हो। इसलिए खतरनाक कीटनाशकों को हटाना कोई बाधा नहीं, बल्कि एक शर्त है। Himachal Pradesh का भविष्य उसके किसानों, नदियों और मिट्टी के स्वास्थ्य पर टिका है।

Author: Sunita Gupta

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