ईरान युद्ध का असर हिमाचल तक! गैस सिलेंडर के लिए मची भयानक मारामारी, चूल्हे पर खाना पकाने को मजबूर हुए लोग

Himachal News: ईरान युद्ध की सुगबुगाहट से हिमाचल प्रदेश में गैस सिलेंडरों को लेकर भारी घबराहट फैल गई है। डर के कारण लोग तेजी से एलपीजी सिलेंडर बुक कर रहे हैं। बुकिंग में अचानक 30 से 35 फीसदी का भारी उछाल आया है। आलम यह है कि मार्च के पहले 15 दिनों में ही बुकिंग और डिलीवरी के बीच का अंतर तीन लाख के पार पहुंच गया है। कमर्शियल गैस की किल्लत से होटल और ढाबे बंद होने की कगार पर हैं। प्रदेश के राजस्व मंत्री ने इस संकट का सीधा ठीकरा केंद्र सरकार की विदेश नीति पर फोड़ दिया है।

डर के साये में ताबड़तोड़ बुकिंग, डिलीवरी का सिस्टम फेल

आम जनता के मन में गैस खत्म होने का गहरा खौफ बैठ गया है। आंकड़ों को देखें तो हालात काफी चिंताजनक नजर आते हैं। फरवरी के पहले पखवाड़े में 4 लाख 82 हजार से अधिक बुकिंग हुई थीं। तब करीब 95 हजार सिलेंडरों का बैकलॉग बचा था। लेकिन मार्च के शुरुआती 15 दिनों के आंकड़े बहुत डराने वाले हैं। इस दौरान 6 लाख 45 हजार से ज्यादा लोगों ने गैस बुक कर दी। इसके मुकाबले विभाग सिर्फ 3 लाख 16 हजार सिलेंडर ही बांट सका। इससे बुकिंग और डिलीवरी का अंतर बढ़कर 3 लाख 28 हजार को पार कर गया है।

घरेलू गैस की कमी नहीं, कमर्शियल सप्लाई पर लगा बड़ा ब्रेक

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन ने लोगों से घबराहट में बुकिंग न करने की अपील की है। कंपनी के मंडलीय एलपीजी बिक्री प्रमुख मोहम्मद आमिद ने अहम जानकारी साझा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि घरेलू एलपीजी सिलेंडरों की कोई किल्लत नहीं है। बद्दी, ऊना और जालंधर के प्लांट से सभी 12 जिलों में नियमित सप्लाई हो रही है। हालांकि, कमर्शियल सिलेंडरों पर कड़ी राशनिंग लागू कर दी गई है। फिलहाल मांग का सिर्फ 20 फीसदी कमर्शियल गैस ही मिल पा रही है। कंपनी इसे जल्द ही 40 से 50 फीसदी तक बढ़ाने पर गंभीरता से विचार कर रही है।

मंत्री ने केंद्र को घेरा, होटलों के मेन्यू कटे और जले पुराने चूल्हे

इस गंभीर गैस संकट ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है। हिमाचल प्रदेश के राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। उनका सीधा आरोप है कि केंद्र की गलत विदेश नीति के कारण ईरान जैसे मित्र देशों से संबंध बिगड़े हैं। पश्चिम एशिया के इसी बड़े संघर्ष का खामियाजा आज हिमाचल की आम जनता भुगत रही है। गैस न मिलने से कई छोटे-बड़े ढाबे बंद हो गए हैं। बड़े होटलों और रेस्तरां ने अपना मेन्यू काफी छोटा कर दिया है। मजबूरी में लोग अब फिर से पुराने पारंपरिक चूल्हे जलाने लगे हैं।

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