Tamil Nadu News: तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के अप्रत्याशित नतीजों ने न केवल सूबे की सियासत को बदल दिया है, बल्कि इसका बड़ा असर देश की राजधानी दिल्ली की राजनीति पर भी दिखने लगा है। राज्य में सत्ताधारी द्रमुक और कांग्रेस का पुराना गठबंधन पूरी तरह टूट चुका है।
इस बड़ी राजनीतिक टूट के बाद केंद्र की सत्ता पर काबिज भाजपा अपने लिए नए समीकरण तलाश रही है। सूत्रों के अनुसार भाजपा संसद के भीतर अपने आंकड़ों को मजबूत करने के लिए द्रमुक से मुद्दों के आधार पर सहयोग लेने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रही है।
कांग्रेस से नाराज द्रमुक ने संसद में बदली बैठने की व्यवस्था
चुनाव में कांग्रेस ने द्रमुक का साथ छोड़कर सुपरस्टार विजय की नई पार्टी टीवीके का दामन थाम लिया था। इस कदम से द्रमुक बेहद नाराज है और उसने कांग्रेस पर धोखा देने का आरोप लगाया है। यह कड़वाहट अब संसद के भीतर भी दिखाई देने लगी है।
द्रमुक ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर सदन में अपने सांसदों के बैठने की जगह बदलने की मांग की है। वे अब विपक्ष में कांग्रेस के साथ नहीं बैठना चाहते। सुपरस्टार विजय की ऐतिहासिक जीत के बाद द्रमुक राज्य में राजनीतिक रूप से काफी कमजोर हुई है।
संसद में दो-तिहाई बहुमत के लिए भाजपा को चाहिए द्रमुक का साथ
भाजपा मुख्य रूप से संसद में अपने आंकड़ों को दुरुस्त करना चाहती है। हाल ही में हुए परिसीमन विधेयक पर मतदान के दौरान सत्तारूढ़ एनडीए जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने में नाकाम रहा था। सदन में दो-तिहाई बहुमत साबित करने के लिए कुल 362 सदस्यों का समर्थन चाहिए।
एनडीए इस जादुई आंकड़े से फिलहाल 70 सीटें दूर है। पिछले मतदान में एनडीए को 298 वोट मिले थे, जबकि विपक्ष के खाते में 230 वोट गए थे। तब द्रमुक के 22 सांसदों ने इस बिल के विरोध में पुरजोर तरीके से मतदान किया था।
अगर भविष्य में द्रमुक के ये 22 सांसद भाजपा के पक्ष में आते हैं या मतदान का बहिष्कार करते हैं, तो सरकार के लिए राह आसान हो जाएगी। इसके अलावा पश्चिम बंगाल और असम में बड़ी जीत के बाद भी भाजपा अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती।
ओडिशा मॉडल पर द्रमुक को साधने की रणनीति
बीजेपी द्रमुक को सीधे एनडीए में शामिल करने के बजाय नवीन पटनायक या जगन मोहन रेड्डी वाले पुराने मॉडल पर साधना चाहती है। इसके तहत द्रमुक गठबंधन से बाहर रहकर भी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय विधेयकों पर केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन दे सकती है।
हालांकि, वैचारिक स्तर पर परिसीमन योजना और सनातन धर्म पर उदयनिधि स्टालिन के पुराने बयानों के कारण दोनों दलों में गहरी खाई है। इन संवेदनशील मुद्दों पर एमके स्टालिन की पार्टी के लिए कोई भी बीच का रास्ता निकालना बेहद पेचीदा और चुनौतीपूर्ण साबित होगा।
Author: Harikarishan Sharma


