Himachal News: सनातन धर्म में चैत्र नवरात्रि का बहुत महत्व है। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में एक अद्भुत मंदिर है। इसे ज्वाला देवी शक्तिपीठ कहते हैं। यहां आस्था और रहस्य का एक अनोखा संगम दिखता है। इन नौ दिनों में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
इस मंदिर की खासियत पूरी दुनिया को हैरान करती है। यहां सदियों से नौ प्राकृतिक ज्वालाएं लगातार जल रही हैं। इनमें कोई घी या तेल नहीं डाला जाता है। न ही कोई बाती लगाई जाती है। विज्ञान भी इस रहस्य के आगे पूरी तरह नतमस्तक है।
देवी पुराण में कुल 51 शक्तिपीठों का जिक्र मिलता है। ज्वाला देवी शक्तिपीठ उन्हीं में से एक है। चैत्र नवरात्रि में यहां पूजा-अर्चना का विशेष विधान है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होती है। श्रद्धालु माता को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखते हैं।
भगवान शिव का क्रोध और जहां गिरी सती की जीभ
इस ऐतिहासिक मंदिर से एक पुरानी पौराणिक कथा जुड़ी है। कथा के अनुसार, राजा दक्ष ने माता सती को यज्ञ में नहीं बुलाया। सती को यह अपना बड़ा अपमान लगा। दुख में उन्होंने यज्ञ में आत्मदाह कर लिया। इसके बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे।
शिव के भारी क्रोध को शांत करने के लिए भगवान विष्णु आगे आए। उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े किए। ये अंग जहां भी गिरे, वहां शक्तिपीठ बन गए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हिमाचल के कांगड़ा में माता सती की जीभ गिरी थी।
इसी कारण इस पवित्र जगह को ज्वाला देवी मंदिर कहा जाता है। यहां जलने वाली मुख्य ज्वाला को साक्षात माता महाकाली का रूप माना जाता है। मंदिर के अंदर नौ स्थानों से ये ज्वालाएं निरंतर जलती हैं। इन्हें नौ अलग-अलग देवियों का प्रतीक माना जाता है।
अखंड ज्वाला के दर्शन और पूरी होती हैं भक्तों की मुरादें
मान्यताओं के अनुसार, ज्वाला देवी के दर्शन से इंसान के सभी पाप नष्ट होते हैं। मां ज्वाला अपने दर पर आने वाले भक्तों की हर मुराद पूरी करती हैं। जिनके विवाह में मुश्किलें आ रही हैं, उन्हें यहां आकर सच्चे मन से प्रार्थना करनी चाहिए।
ऐसा माना जाता है कि मां के आशीर्वाद से शादी की सभी बाधाएं तुरंत दूर होती हैं। चैत्र नवरात्रि के दौरान यहां का नजारा बेहद भव्य और दिव्य होता है। दूर-दूर से लोग केवल इस चमत्कार को अपनी आंखों से देखने और माथा टेकने यहां आते हैं।


