खेत में उगने वाला यह साधारण पौधा बदल देगा कंस्ट्रक्शन की दुनिया, वैज्ञानिक तकनीक से अब बेहद सस्ते में बनेंगे मजबूत मकान

Prayagraj News: मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के वैज्ञानिकों ने एक अनोखा कारनामा कर दिखाया है। शोधकर्ताओं ने सिसल पौधे के रेशे से एक बेहद खास और मजबूत निर्माण सामग्री बनाई है। यह तकनीक भविष्य में सीमेंट और कंक्रीट का एक बेहतरीन और सस्ता विकल्प बनेगी। इससे ग्रामीण इलाकों में बेहद कम लागत वाले पर्यावरण-अनुकूल मकान बनाना आसान हो जाएगा।

अगावे पौधे से तैयार हुआ अनोखा सिसल रेशा

सिसल दरअसल एक प्राकृतिक रेशा है। यह अगावे नामक पौधे की पत्तियों से मिलता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड में यह पौधा बहुतायत में उगता है। अभी तक लोग इसका उपयोग केवल रस्सियां, कालीन और हस्तशिल्प उत्पाद बनाने में करते थे। मगर अब वैज्ञानिकों ने इस पौधे का इस्तेमाल सीधे घरों के निर्माण के लिए ढूंढ निकाला है।

पर्यावरण सुरक्षा के साथ निर्माण लागत होगी बेहद कम

यह महत्वपूर्ण शोध सिविल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनुपम रावत की देखरेख में शोध छात्र राजू रंजन कुमार ने पूरा किया है। डॉ. रावत के मुताबिक भवन निर्माण उद्योग दुनिया भर में सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जित करता है। सीमेंट उत्पादन में भारी मात्रा में ऊर्जा नष्ट होती है। ऐसे में प्राकृतिक रेशों का उपयोग पर्यावरण के लिए वरदान साबित होगा।

वैज्ञानिकों ने इस तरह तैयार की जादुई तकनीक

शोधकर्ताओं ने सिसल फाइबर को ग्लास फाइबर और सीमेंट के साथ मिलाकर एक नया हाइब्रिड कंपोजिट तैयार किया। आम तौर पर प्राकृतिक रेशों में मौजूद मोम और लिग्निन जैसी अशुद्धियां सीमेंट की पकड़ कमजोर कर देती हैं। इस गंभीर तकनीकी समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने सिसल फाइबर को एक विशेष रासायनिक उपचार प्रक्रिया से गुजारा है।

अंतरराष्ट्रीय जर्नल में मिली इस शोध को बड़ी मान्यता

इस अद्भुत वैज्ञानिक खोज के परिणाम इतने प्रभावशाली रहे कि इन्हें ‘कंस्ट्रक्शन एंड बिल्डिंग मैटेरियल्स’ नामक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल में जगह मिली है। आठ इम्पैक्ट फैक्टर वाले इस जर्नल में प्रकाशन संस्थान के लिए बड़ी उपलब्धि है। इस नई हाइब्रिड सामग्री से बने मकानों को लंबे समय तक बहुत कम रखरखाव की जरूरत पड़ेगी।

यह खोज न केवल निर्माण क्षेत्र में क्रांति लाएगी बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी मददगार होगी। अब बेकार समझे जाने वाले पौधों से भी अच्छी कमाई की जा सकेगी। संस्थान के इस प्रयास से देश में हरित निर्माण और टिकाऊ विकास के सपनों को एक नई और मजबूत उड़ान मिलने की पूरी उम्मीद है।

Author: Ajay Mishra

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