सावधान! भारत के पास सिर्फ 5 दिन का तेल? CAG रिपोर्ट के चौंकाने वाले खुलासे ने बढ़ाई सरकार की टेंशन

India News: क्या भारत के पास संकट के समय इस्तेमाल होने वाला तेल खत्म हो रहा है? नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की 2025 की ऑडिट रिपोर्ट ने एक ऐसी सच्चाई उजागर की है, जो मुल्क की ऊर्जा सुरक्षा पर सवाल खड़े करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के रणनीतिक तेल भंडार (SPR) अपनी कुल क्षमता का एक-तिहाई से ज्यादा खाली पड़े हैं। बीबीसी के एक ताजा विश्लेषण में सामने आया है कि वर्तमान में यह भंडार केवल पांच दिन की देशव्यापी मांग को पूरा करने के काबिल है। हालांकि, केंद्र सरकार और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में भरोसा दिलाया है कि घबराने की जरूरत नहीं है और ईंधन का पर्याप्त स्टॉक मौजूद है।

CAG रिपोर्ट ने खोली व्यवस्था की पोल

देश में तेल के भंडार के लिए आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में तीन खास जगहें बनाई गई हैं। इनकी कुल क्षमता 5.33 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) कच्चा तेल रखने की है। हैरानी की बात यह है कि इसमें से केवल 3.372 MMT हिस्सा ही भरा हुआ है। यानी देश की सुरक्षा के लिए बनाया गया करीब 36 प्रतिशत भंडार सालों से खाली पड़ा है। इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व्स लिमिटेड (ISPRL) इन भंडारों की देखरेख करती है। ऑडिट ने इस बात पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं कि भंडारण क्षमता बढ़ाने का काम कछुआ चाल से क्यों चल रहा है।

क्या वाकई 74 दिन का है सुरक्षा कवच?

सरकार का कहना है कि भारत की कुल भंडारण क्षमता लगभग 74 दिन की है। इसमें रणनीतिक भंडार के साथ-साथ तेल कंपनियों के पास मौजूद 64.5 दिन का स्टॉक भी शामिल है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय मानकों से काफी कम है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) कम से कम 90 दिन का भंडार रखने की सलाह देती है। इसके मुकाबले जापान के पास 208 दिन और दक्षिण कोरिया के पास 200 दिन का तेल जमा है। भारत अपनी जरूरत का 88 फीसदी तेल आयात करता है, ऐसे में इतना कम स्टॉक किसी भी बड़े संकट के समय जोखिम भरा हो सकता है।

खाड़ी देशों पर निर्भरता और रणनीतिक चूक

भारत के कच्चे तेल के आयात का 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा आज भी मध्य-पूर्व के देशों जैसे इराक और सऊदी अरब से आता है। इस क्षेत्र में युद्ध या तनाव होने पर भारत की सप्लाई चेन तुरंत प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि हमें तब भंडार भरना चाहिए था जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल से कम थीं। अब जब कीमतें 100 डॉलर के पार जा रही हैं, तो भंडार भरना बेहद महंगा सौदा साबित होगा। सरकार अब नवीकरणीय ऊर्जा और घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है ताकि इस कमजोरी को दूर किया जा सके।

पैनिक बाइंग से बचने की सलाह

जैसे ही भंडार खाली होने की खबर फैली, कई शहरों के पेट्रोल पंपों पर भीड़ उमड़ पड़ी। लोगों ने डर के मारे गाड़ियों की टंकियां फुल करवानी शुरू कर दीं। पेट्रोलियम राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने राज्यसभा में स्पष्ट किया कि हालात पूरी तरह नियंत्रण में हैं। सरकार का तर्क है कि रणनीतिक भंडार सिर्फ आपातकालीन सुरक्षा कवच है, जबकि तेल कंपनियों के पास रोजमर्रा की जरूरतों के लिए पर्याप्त परिचालन भंडार (Operating Stock) मौजूद है। सरकार ने तेल आयात के स्रोतों में भी विविधता लाने का दावा किया है ताकि किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो सके।

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