Himachal News: पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध की आग अब हिमाचल के खेतों तक पहुंच गई है। प्रदेश के किसान और बागवान इन दिनों यूरिया संकट का सामना कर रहे हैं। रबी और सेब के अहम सीजन में खाद नहीं मिल रही है। हिमफेड और सहकारी समितियों के पास स्टॉक खत्म हो चुका है। इससे फसल उत्पादन पर गहरा असर पड़ने का खतरा मंडरा रहा है।
यूरिया की सप्लाई पूरी तरह ठप
हिमाचल में नेशनल फर्टिलाइजर्स लिमिटेड (एनएफएल) यूरिया सप्लाई करती है। लेकिन पिछले दो महीने से कंपनी ने आपूर्ति रोक दी है। अधिकृत विक्रेताओं के पास भी अब यूरिया उपलब्ध नहीं है। संकट देखते हुए हिमफेड ने इफको से खाद खरीदी है। हालांकि वहां से भी मांग के मुताबिक बहुत कम यूरिया मिला है।
मांग बहुत ज्यादा, सप्लाई बेहद कम
हिमफेड के ताजा आंकड़ों ने चिंता बढ़ा दी है। प्रदेश भर से करीब 3626.100 मीट्रिक टन यूरिया की मांग आई है। लेकिन इफको ने केवल 900 मीट्रिक टन की सप्लाई दी है। यह खाद प्रदेश के कुछ ही केंद्रों तक पहुंच पाई है। इससे ज्यादातर किसान और बागवान खाली हाथ लौट रहे हैं।
सेब और सब्जियों की फसल पर संकट
मार्च और अप्रैल का महीना खेती के लिए बेहद अहम होता है। इस वक्त सेब के पेड़ों को यूरिया की सख्त जरूरत होती है। यूरिया से पौधों की ग्रोथ और उत्पादन तेजी से बढ़ता है। इसके अलावा मटर और गोभी जैसी सब्जियों में भी यूरिया डलता है। समय पर खाद न मिलने से किसानों की आय घट सकती है।
खाद महंगी होने से दोहरी मार
उर्वरक की कमी के बीच महंगाई ने भी किसानों की कमर तोड़ दी है। एमओपी उर्वरक के दाम 50 रुपये प्रति बोरी बढ़ गए हैं। 50 किलो की बोरी पहले 1800 रुपये की आती थी। अब किसानों को इसके लिए 1850 रुपये चुकाने पड़ेंगे। 12:32:16 की 50 किलो की बोरी 1900 रुपये में मिल रही है। यूरिया की 45 किलो की बोरी 266.50 रुपये में उपलब्ध है।
अंतरराष्ट्रीय युद्ध का सीधा असर
केंद्र सरकार की तरफ से खाद आवंटन में काफी देरी हुई है। इससे राज्यों को समय पर यूरिया नहीं मिल पा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रहे युद्ध ने सप्लाई चेन तोड़ी है। प्राकृतिक गैस जैसे कच्चे माल की कमी से उत्पादन घट गया है। इसी कारण हिमाचल के किसानों को यह बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।


