Himachal News: तिब्बती धार्मिक स्वतंत्रता पर एक बड़ी खबर आई है। चेक गणराज्य की सीनेट ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया है। यह प्रस्ताव 25 मार्च 2026 को पास हुआ। इस फैसले ने चीन को कड़ा संदेश दिया है। दलाई लामा के उत्तराधिकारी को चुनने में चीन का कोई अधिकार नहीं है। यह चीन की तानाशाही नीतियों पर करारा प्रहार है। दुनिया अब तिब्बत के लोगों के साथ खड़ी है।
तिब्बती लोगों का है अंतिम फैसला
चेक सीनेट ने इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पास किया। प्रस्ताव के पक्ष में पूरे 40 वोट पड़े। सीनेट में किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया। सीनेट ने अपनी बात एकदम स्पष्ट कर दी है। 15वें दलाई लामा का चयन केवल तिब्बती लोग ही करेंगे। यह अधिकार सिर्फ उनकी पारंपरिक संस्था गदेन फोडरंग के पास है। दलाई लामा का उत्तराधिकारी चुनना तिब्बती समुदाय का आंतरिक मामला है। यह उनका अपना धार्मिक विषय है। इसमें चीन का दखल बिल्कुल स्वीकार नहीं किया जाएगा।
चीन के कानून का कड़ा विरोध
चेक सीनेट ने चीन के नए कानून की कड़ी आलोचना की। चीन ने 12 मार्च 2026 को जातीय एकता कानून बनाया था। सीनेट ने इस कानून का पुरजोर विरोध किया है। सीनेट ने इसे तिब्बती संस्कृति को खत्म करने की साजिश बताया। चीन इसके जरिए तिब्बती भाषा और पहचान को मिटाना चाहता है। अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत धार्मिक विविधता की रक्षा करना जरूरी है। सभी देशों को इस नियम का सम्मान करना चाहिए।
तिब्बत के लिए उम्मीद की नई किरण
सीनेट की उपाध्यक्ष जित्का साइटलोवा ने यह प्रस्ताव पेश किया था। प्रेमिस्ल राबास और जिरी रूजिच्का ने इसका समर्थन किया। बैठक की अध्यक्षता सीनेट के उपाध्यक्ष जिरी ओबरफाल्जर ने की। बैठक में चेक राष्ट्रपति पेत्र पावेल की मुलाकात का जिक्र हुआ। उन्होंने जुलाई 2025 में दलाई लामा से मुलाकात की थी। दलाई लामा की प्रतिनिधि थिनले चुक्की ने फैसले का स्वागत किया। उन्होंने इसे तिब्बत के लोगों के लिए उम्मीद की किरण बताया। दुनिया की कोई भी सरकार धार्मिक परंपराओं को नियंत्रित नहीं कर सकती है।
राष्ट्रीय प्रतीकों के लिए नए नियम
इधर तिब्बती निर्वासित संसद ने भी अहम फैसले लिए हैं। गुरुवार को संसद के 11वें सत्र में एक विधेयक पास हुआ। यह विधेयक राष्ट्रीय ध्वज, प्रतीक और राष्ट्रगान के उपयोग पर है। बैठक की अध्यक्षता खेनपो सोनम तेनफेल ने की। प्रधानमंत्री पेंपा सेरिंग ने विधेयक में कुछ संशोधन पेश किए। सदन ने इन सभी बदलावों को तुरंत स्वीकार कर लिया। राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास और रंगों से जुड़े नियम भी पास हो गए।


