सुप्रीम कोर्ट में 14 साल चला गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा, फैसला आने से पहले ही दो दोषियों की मौत

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Delhi News: देश की न्याय प्रणाली में ‘देर से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है’ का सिद्धांत एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट में गैर-इरादतन हत्या के एक मामले में अंतिम फैसला आने में करीब 14 साल का लंबा वक्त लग गया। इस दौरान मामले के तीन दोषियों में से दो की मौत हो चुकी है।

यह हैरान करने वाला मामला भारतीय अदालतों में मुकदमों के लंबित रहने की कड़वी हकीकत को बयां करता है। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने भी हाल ही में कहा था कि देरी से मिला न्याय, न्याय की हत्या जैसा है। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी करने में बहुत लंबा समय लिया।

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निचली अदालत और हाईकोर्ट ने जल्द दिया था फैसला

इस आपराधिक मामले को सुलझाने में जहां शीर्ष अदालत ने 14 साल लगा दिए, वहीं निचली अदालत और उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहीं ज्यादा तेजी दिखाई थी। ट्रायल कोर्ट ने महज 5 साल में सुनवाई पूरी कर ली थी, जबकि हाईकोर्ट ने 10 साल के भीतर इस अपील का निपटारा कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक यह अपील सितंबर 2012 में दायर की गई थी। इसके बाद पिछले 14 सालों के दौरान इस केस को केवल 12 बार ही सुनवाई के लिए लिस्ट किया गया। यानी अदालत में साल में औसतन एक बार भी इस महत्वपूर्ण मामले पर ठीक से बहस नहीं हो सकी।

महज 500 रुपये की घड़ी के विवाद में गई थी जान

यह पूरा विवाद साल 1997 में महज 500 रुपये की एक घड़ी की बिक्री को लेकर शुरू हुआ था। दो पक्षों में हुई मामूली हाथापाई के दौरान पीड़ित शख्स पास की एक सूखी नहर में गिर गया था। पथरीली जमीन पर गिरने से सिर में गंभीर चोट आई और उसकी अस्पताल में मौत हो गई थी।

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने इस मामले पर अंतिम फैसला सुनाते हुए समय के इस लंबे अंतराल पर गहरी चिंता जताई। कोर्ट ने माना कि घटना के समय मुख्य आरोपी की उम्र 33 साल थी, जो आज 2026 में 60 वर्ष से अधिक का बुजुर्ग हो चुका है और उसके दो साथी मर चुके हैं।

अदालत ने समय के इस मोड़ पर न्याय का तकाजा देखते हुए जीवित बचे इकलौते दोषी की सजा को कम कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने उसकी दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा, लेकिन 5 साल की जेल की सजा को घटाकर उतने समय में तब्दील कर दिया, जितना वह पहले ही जेल में काट चुका था।

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