Himachal Politics: अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हिमाचल प्रदेश में तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट, नया दल बनाने की तैयारी

- Advertisement -

Shimla News: हिमाचल प्रदेश में अगले साल यानी 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। राज्य में पारंपरिक रूप से कांग्रेस और बीजेपी के बीच मुकाबला होता है। हालांकि, इस बार चुनाव से पहले एक नया राजनीतिक दल यानी तीसरा मोर्चा बनाने की गंभीर कवायद शुरू हो चुकी है।

पूर्व मंत्री डॉ. राम लाल मार्कंडा का बड़ा दावा

बीजेपी के पूर्व मंत्री डॉक्टर राम लाल मार्कंडा ने दावा किया है कि चुनाव से पहले नई पार्टी का गठन हो सकता है। पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण भाजपा ने साल 2024 में मार्कंडा को निष्कासित कर दिया था। वे अब दोनों प्रमुख दलों के उन असंतुष्ट नेताओं से संपर्क कर रहे हैं जो हाशिए पर हैं।

- Advertisement -

लाहौल-स्पीति के पूर्व विधायक मार्कंडा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वे पंचायत चुनाव के नतीजों का इंतजार कर रहे थे। अब वरिष्ठ नेताओं के साथ दूसरे दौर की बातचीत शुरू होगी। उनका लक्ष्य अगले साल मार्च या अप्रैल तक नई पार्टी को पूरी तरह से लॉन्च करने का है ताकि जमीनी काम पूरा हो सके।

घुटन महसूस कर रहे नेताओं को मिलेगा नया मंच

मार्कंडा का आरोप है कि कांग्रेस और बीजेपी के कई बड़े नेताओं को अपनी पार्टियों में उचित सम्मान और जगह नहीं मिल रही है। बारी-बारी से सत्ता बदलने के बावजूद वरिष्ठ कार्यकर्ता घुटन महसूस कर रहे हैं। इसलिए एक ऐसे नए विकल्प की जरूरत है जो वरिष्ठ नेताओं का सम्मान करे और जनता का कल्याण करे।

इस बीच, तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट पर कांग्रेस और भाजपा के नेताओं की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि नई पार्टी बनानी है तो उसे जल्द घोषित करना चाहिए। आखिरी समय में बागी नेताओं को टिकट देकर पार्टी खड़ा करने का फॉर्मूला अतीत में पूरी तरह नाकाम रहा है।

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में तीसरे मोर्चे का इतिहास

हिमाचल के राजनीतिक इतिहास में तीसरा मोर्चा कभी भी स्थायी रूप से सफल नहीं रहा है। राज्य में जब भी कोई तीसरी पार्टी बनी है, वह ज्यादा दिन नहीं टिक सकी। अक्सर बागी नेता ही ऐसी पार्टियां बनाते हैं और राजनीतिक अवसर मिलते ही वापस अपने पुराने और मुख्य दलों में लौट जाते हैं।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का मानना है कि नई पार्टी बनने से कांग्रेस को नहीं बल्कि बीजेपी को भारी नुकसान होगा। वहीं मार्कंडा का दावा है कि मुख्यमंत्री सुक्खू इस नए मोर्चे के बहाने कांग्रेस के भीतर ही पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के गुट के नेताओं को पूरी तरह से दरकिनार करना चाहते हैं।

इतिहास देखें तो 1997 में सुखराम ने हिमाचल विकास कांग्रेस बनाई थी जिसने पांच सीटें जीतीं, लेकिन बाद में वह कांग्रेस में शामिल हो गई। इसी तरह 2012 में महेश्वर सिंह ने हिमाचल लोकहित पार्टी बनाई थी। इसके अलावा विजय सिंह मनकोटिया की जनता दल और 1970 की लोक राज पार्टी भी अंततः बिखर गईं।

- Advertisement -

बड़ी खबरें

Topics

Related Articles