Bengaluru News: भारतीय जनता पार्टी की चुनावी रणनीति में दक्षिण भारत इस समय सबसे कमजोर कड़ी साबित हो रहा है। इसके विपरीत उसकी मुख्य विरोधी पार्टी कांग्रेस को इस क्षेत्र में लगातार बढ़त मिल रही है। दक्षिण में भाजपा का इकलौता मजबूत गढ़ माने जाने वाला कर्नाटक भी इस समय आंतरिक कलह से जूझ रहा है।
ऐसे राजनीतिक माहौल में तेलंगाना और कर्नाटक के आगामी विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए परीक्षा की घड़ी साबित होंगे। भाजपा ने देश के उत्तरी, पश्चिमी और मध्य हिस्सों में अपनी मजबूत पकड़ बनाई हुई है। इसके बावजूद दक्षिण भारत के ताजा सियासी घटनाक्रम उसके केंद्रीय नेतृत्व के लिए गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं।
कमजोर पड़ने पर कांग्रेस को हमेशा दक्षिण से मिली संजीवनी
देश के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो जब भी केंद्र में कांग्रेस कमजोर हुई है, उसे दक्षिण भारत से ही नई ताकत मिली है। वर्तमान समय में दक्षिण के पांच प्रमुख राज्यों में से चार में कांग्रेस सत्ता का हिस्सा है। केरल, तेलंगाना और कर्नाटक में कांग्रेस के मुख्यमंत्री कमान संभाल रहे हैं।
इसके विपरीत तमिलनाडु में भी कांग्रेस सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार में शामिल है। दूसरी तरफ बीजेपी के पास इस क्षेत्र में अपने दम पर एक भी राज्य नहीं है। पार्टी केवल आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के साथ मिलकर गठबंधन सरकार का हिस्सा बनी हुई है।
लोकसभा की 131 सीटों में से भाजपा के पास केवल 29 सीटें
संसदीय आंकड़ों को देखें तो दक्षिण भारत की कुल 131 लोकसभा सीटों में से भाजपा के पास महज 29 सीटें हैं। बीजेपी की कोशिश साल 2028 के तेलंगाना और कर्नाटक चुनावों में बड़ी जीत हासिल कर 2029 के आम चुनावों के लिए जमीन मजबूत करने और कांग्रेस को रोकने की है।
इतिहास गवाह है कि साल 1977 में जब उत्तर भारत से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था, तब भी दक्षिण ने इंदिरा गांधी का साथ दिया था। इंदिरा गांधी ने कर्नाटक के चिकमंगलूर से उपचुनाव जीतकर संसद में वापसी की थी। इसके बाद 1980 में उन्होंने आंध्र प्रदेश के मेढक से जीत दर्ज की थी।
विधान परिषद चुनाव में भाजपा को झेलनी पड़ी क्रॉस वोटिंग
लोकसभा चुनावों में फिर से बहुमत पाने के लिए भाजपा को दक्षिण के राज्यों में हर हाल में अपनी ताकत बढ़ानी होगी। कर्नाटक में कांग्रेस ने हाल ही में सफल नेतृत्व परिवर्तन कर स्थिति को संभाल लिया है, लेकिन बीजेपी विपक्ष में होने के बावजूद आपसी गुटबाजी से परेशान है।
हाल ही में हुए कर्नाटक विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव में बीजेपी को अपने ही विधायकों की क्रॉस वोटिंग का सामना करना पड़ा है। इस अंदरूनी कलह को दूर करने के लिए बीजेपी अब इन राज्यों में अपने सबसे सीनियर रणनीतिकारों और अनुभवी चुनाव प्रबंधकों की टीम को तैनात करने की योजना बना रही है।

