National News: इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ा भीषण युद्ध भले ही अब पूरी तरह थम गया हो, लेकिन इसकी वजह से जीवनरक्षक दवाओं के दामों में हुआ बेतहाशा इजाफा अभी भी कम नहीं हुआ है। दवा निर्माता कंपनियां कच्चे माल की बढ़ी कीमतों का बहाना बनाकर बढ़े दाम वापस लेना भूल गई हैं।
इस मुनाफाखोरी के कारण न केवल एलोपैथी बल्कि होम्योपैथिक और आयुर्वेदिक दवाएं भी लगातार महंगी हो रही हैं। दो महीने पहले यानी 1 अप्रैल 2026 से आवश्यक दवाओं की कीमतों में संशोधन हुआ था। इसके बाद शुगर, ब्लड प्रेशर और अन्य गंभीर बीमारियों की दवाएं करीब 10 से 12 फीसदी महंगी हो गई थीं।
कच्चा माल महंगा होने से बढ़ी दवाओं की उत्पादन लागत
विशेषज्ञों के मुताबिक दवाओं में इस्तेमाल होने वाला मुख्य कच्चा माल यानी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रेडिएंट (एपीआई) अंतरराष्ट्रीय बाजार में 25 से 40 फीसदी तक महंगा हो गया था। इसके चलते सभी जरूरी दवाओं के खुदरा दाम में 20 से 40 फीसदी का भारी उछाल आया है, जो लगातार जारी है।
भारत में दवाओं की कीमतें तय करने वाली सरकारी संस्था नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) ने नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन में शामिल दवाओं के दाम बढ़ाए थे। एनपीपीए ने कीमतों में करीब 0.65 फीसदी की आंशिक बढ़ोतरी की अनुमति दी थी, लेकिन कंपनियों ने वास्तविक दाम बहुत बढ़ा दिए।
गले के इन्फेक्शन से लेकर बुखार की गोलियां हुईं महंगी
संशोधित कीमतों के बाद गले के इन्फेक्शन की एजिथ्रोमाइसिन की तीन गोलियों की कीमत 80 रुपये से बढ़कर सीधे 98 रुपये हो गई है। सामान्य बुखार और बदन दर्द में काम आने वाली पैरासिटामॉल का 10 गोलियों का पत्ता अब 8 रुपये के बजाय 14 रुपये में बिक रहा है।
इसी तरह मोंटेलूकास्ट सोडियम का पत्ता 180 रुपये से बढ़कर 240 रुपये का हो गया है। दर्द निवारक डायक्लोफेनक सोडियम की 10 गोलियों के दाम 20 रुपये से बढ़कर 35 रुपये हो गए हैं। संक्रमण रोकने वाली एंटीबायोटिक सिप्रोफ्लोक्सेसिन और एमिकासिन की कीमतें भी 25 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं।
थोक बाजार में कच्चे माल के दाम आसमान पर पहुंचे
दवाओं के थोक बाजार में अस्किलोफिनेक का दाम 935 रुपये से बढ़कर 975 रुपये प्रति किलो हो गया है। पैरासिटामॉल का एपीआई 255 से बढ़कर 310 रुपये और क्लोरोज़ोन 710 से बढ़कर 880 रुपये पहुंच गया है। सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला मिथाइलकोबालामिन 1.15 लाख से बढ़कर 1.35 लाख रुपये प्रति किलो हो चुका है।
दवाओं की पैकिंग में इस्तेमाल होने वाली पीवीसी और पॉली बैग्स की कीमतें भी 40 फीसदी तक बढ़ गई हैं। इस वजह से मेटफॉर्मिन, ग्लिमेपाइराइड, एमलोडिपिन, टेल्मिसर्टन, एटोरवास्टैटिन, एस्पिरिन, पैंटोप्राजोल, ओमेप्राजोल और साल्बुटामोल जैसी जरूरी दैनिक दवाएं गरीब मरीजों के बजट से पूरी तरह बाहर हो गई हैं।
कैमिस्ट एसोसिएशन ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की
होलसेलर और रिटेलर कैमिस्ट एसोसिएशन के महामंत्री घनश्याम मित्तल ने बताया कि दवाओं के दाम एनपीपीए के नियमों के अनुसार बढ़े थे। सरकार चाहे तो इनमें तत्काल कटौती कर सकती है। जेनरिक दवा थोक विक्रेता रजनीश कौशल के मुताबिक जब तक पेट्रोल-डीजल सस्ता नहीं होगा, तब तक माल ढुलाई और कच्चे माल के दाम कम नहीं होंगे।
दवा बाजार के जानकारों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने कच्चे माल के दाम कम करने के लिए कोई ठोस नीतिगत कदम नहीं उठाया, तो आने वाले समय में जीवनरक्षक दवाओं की भारी वैश्विक कमी हो सकती है। फिलहाल आम मरीज इस अभूतपूर्व और चौतरफा महंगाई का दंश झेलने को मजबूर हैं।
Author: Asha Thakur

