Bihar News: बिहार में सम्राट चौधरी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार ने राज्य की राजनीति में नई चर्चाएं छेड़ दी हैं। कुल 32 मंत्रियों के शपथ ग्रहण के बाद सबसे ज्यादा चौंकाने वाला फैसला पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय को लेकर रहा। भाजपा के कद्दावर नेता माने जाने वाले मंगल पांडेय का नाम इस बार कैबिनेट सूची से नदारद रहा। लंबे समय तक स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी संभालने वाले पांडेय का बाहर होना पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए भी किसी झटके से कम नहीं है।
मंगल पांडेय के बाहर होने के पीछे क्या है बड़ी वजह?
मंगल पांडेय साल 2017 से 2022 और फिर हाल के वर्षों में बिहार के स्वास्थ्य मंत्री के रूप में एक प्रभावी चेहरा रहे हैं। उनके कार्यकाल के दौरान स्वास्थ्य विभाग के कई कार्यों की भाजपा मंचों से प्रशंसा भी हुई थी। शपथ ग्रहण समारोह में उनकी उपस्थिति के बावजूद मंत्री न बनाए जाने पर अब कई राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं। सूत्रों का मानना है कि पार्टी उन्हें चुनावी तैयारियों के मद्देनजर संगठन में कोई बहुत बड़ी और अहम जिम्मेदारी देने पर गंभीरता से विचार कर रही है।
पश्चिम बंगाल के प्रभारी के तौर पर मिली बड़ी सफलता
मंगल पांडेय की सांगठनिक क्षमता का लोहा पार्टी आलाकमान भी मानता है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा की प्रचंड जीत के पीछे उनकी रणनीतिक भूमिका को अहम माना जा रहा है। वह बंगाल में भाजपा के प्रभारी के रूप में लंबे समय से सक्रिय थे। राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि बंगाल में पार्टी को मिली ऐतिहासिक सफलता का इनाम उन्हें जल्द ही राष्ट्रीय स्तर पर मिल सकता है। संभवतः इसी कारण उन्हें बिहार सरकार की कैबिनेट से दूर रखा गया है।
मैथिली ठाकुर के तीखे सवालों के बाद सुर्खियों में रहे पांडेय
बजट सत्र के दौरान भाजपा विधायक और प्रसिद्ध लोक गायिका मैथिली ठाकुर ने स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर सदन में मंगल पांडेय को घेरा था। मैथिली ठाकुर ने अस्पतालों की जर्जर हालत और बजट के सही उपयोग को लेकर बेहद कड़े सवाल उठाए थे। उन्होंने सदन में कहा था कि जर्जर अस्पतालों के कारण मरीज डर के साये में इलाज कराने को मजबूर हैं। हालांकि तत्कालीन मंत्री ने जवाब दिए थे, लेकिन मैथिली ठाकुर के असंतोष ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं, जिससे विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे थे।
जातीय और क्षेत्रीय संतुलन साधने पर भाजपा का जोर
सम्राट चौधरी सरकार में इस बार भाजपा ने कई पुराने चेहरों के बजाय नए और ऊर्जावान नेताओं पर भरोसा जताया है। मंत्रिमंडल में भाजपा कोटे से 15 और जदयू से 13 मंत्रियों को जगह मिली है। मंगल पांडेय के अलावा नारायण प्रसाद और सुरेंद्र मेहता जैसे पुराने मंत्रियों को भी इस बार शामिल नहीं किया गया है। पार्टी का स्पष्ट संदेश है कि वह आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को पूरी तरह दुरुस्त करना चाहती है।
भविष्य की रणनीति: क्या संगठन में बढ़ेगा मंगल पांडेय का कद?
मंगल पांडेय को कैबिनेट से बाहर रखना भाजपा की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। बंगाल में उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्हें राष्ट्रीय महासचिव या किसी बड़े चुनावी राज्य का पूर्ण प्रभार सौंपा जा सकता है। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि पांडेय जैसे अनुभवी नेता का उपयोग सरकार के बजाय संगठन को मजबूत करने में किया जाए। फिलहाल बिहार की नई कैबिनेट में हुए इस बड़े बदलाव ने राज्य की अंतर्कलह और भविष्य की राजनीति को नया मोड़ दे दिया है।

