जमीन के नीचे दफन था 800 साल पुराना शिव मंदिर, बच्चों के खेलते समय अचानक सामने आया इतिहास का अनोखा रहस्य

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Madurai News: भारत की पावन भूमि पर जमीन के ऊपर तो कई भव्य और ऐतिहासिक मंदिर दिखाई देते हैं, लेकिन कई बार जमीन के नीचे भी ऐसे चमत्कारी मंदिर मिल जाते हैं जो पूरी दुनिया को हैरान कर देते हैं। ऐसा ही एक अविश्वसनीय वाकया तमिलनाडु के मदुरै जिले में सामने आया है।

मदुरै जिले के मेलूर तालुका में स्थित उडम्पट्टी गांव में कुछ छोटे बच्चे खेल रहे थे। खेलते समय उन्हें जमीन के भीतर कुछ अजीब और प्राचीन नक्काशीदार पत्थर दिखाई दिए। इसके बाद जब पुरातत्व विभाग ने मौके पर पहुंचकर वैज्ञानिक खुदाई शुरू की, तो जमीन के नीचे से 800 साल पुराना पूरा शिव मंदिर निकल आया।

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इतिहास के पन्नों और पुरातत्व विभाग के आधिकारिक दस्तावेजों में इस अत्यंत प्राचीन और पवित्र जगह को ‘थेन्नवानीस्वरम मंदिर’ के नाम से जाना जाता था। सदियों तक मिट्टी के नीचे पूरी तरह दबे रहने के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर दुनिया की नजरों से ओझल रही थी।

राजा मारवर्मन सुंदर पांड्य प्रथम के शासनकाल में हुआ था निर्माण

पांड्य नाडु सेंटर फॉर हिस्टोरिकल रिसर्च के वरिष्ठ इतिहासकारों के मुताबिक, इस भव्य मंदिर का निर्माण करीब 1217 से 1218 ईस्वी के बीच कराया गया था। उस ऐतिहासिक दौर में इस पूरे समृद्ध इलाके में उत्तर पांड्य राजवंश के प्रतापी राजा मारवर्मन सुंदर पांड्य प्रथम का शासन हुआ करता था।

प्राचीन तमिल भाषा में ‘थेन्नवन’ शब्द का विशेष इस्तेमाल पांड्य राजाओं के शाही खिताब के तौर पर किया जाता था। राजा के इसी गौरवशाली नाम के सम्मान में इस भव्य शिव मंदिर का नाम थेन्नवानीस्वरम रखा गया था। मंदिर के मलबे से कई दुर्लभ और महत्वपूर्ण शिलालेख मिले हैं।

जब पुरातत्वविदों ने मंदिर के पत्थरों और विशाल खंभों पर खुदी हुई 13वीं सदी की पुरानी तमिल लिपि का गहन अध्ययन किया, तो कई चौंकाने वाले ऐतिहासिक तथ्य सामने आए। इन शिलालेखों से साफ पता चलता है कि उस जमाने में यह मंदिर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर था।

64 प्राचीन सिक्कों में हुआ था जलाशय की जमीन का सौदा

शिलालेखों के अनुसार, भगवान शिव की रोज की पूजा-आरती और मंदिर के रखरखाव के खर्च के लिए आसपास की जमीनों से मिलने वाले टैक्स (राजस्व) का इस्तेमाल किया जाता था। इसके अलावा, उस दौर में अलगापेरुमल नाम के एक स्थानीय मुखिया ने नागनकुडी नाम के बड़े जलाशय की जमीन मंदिर को बेची थी।

इस पूरी उपजाऊ जमीन का सौदा उस जमाने के 64 प्राचीन सिक्कों में तय हुआ था। इस पूरे सौदे को नम्बी पेराम्बाला कुथन नाम के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ने पूरा कराया था, जिन्हें लोग कांगेयन भी कहते थे। यह बात साबित करती है कि उस दौर में मंदिर समाज की अर्थव्यवस्था के केंद्र थे।

शिल्प शास्त्र के प्राचीन ग्रंथों के आधार पर देखें, तो इस मंदिर का गर्भगृह और पूरा ढांचा पारंपरिक दक्षिण भारतीय वास्तुकला के नियमों के अनुसार बनाया गया था। इसके खंभों पर की गई बारीक नक्काशी पांड्य राजवंश की अनूठी और समृद्ध कला को जीवंत रूप से दर्शाती है।

Karthik Srinivasan

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