Kinshasa News: डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला वायरस ने एक बार फिर तबाही मचाना शुरू कर दिया है। यहां मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस गंभीर स्वास्थ्य संकट को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस अधानॉम घेब्रेयेसस ने खुद प्रभावित इलाकों का दौरा किया है।
कांगो के पूर्वी प्रांत इटुरी में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक महज दो दिनों के भीतर इबोला के पुष्ट मामले लगभग दोगुने हो गए हैं। यह संख्या 121 से बढ़कर सीधे 225 तक पहुंच गई है। स्वास्थ्य अधिकारी इस अचानक आई तेजी से बेहद चिंतित हैं।
अधिकारियों ने जमीन पर 1,000 से अधिक संदिग्ध मरीजों की पहचान की है। इसके साथ ही अब तक 220 से ज्यादा लोगों की संदिग्ध मौत हो चुकी है। विशेषज्ञों को डर है कि जमीनी स्तर पर इस महामारी का असली आकार सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा बड़ा हो सकता है।
बिना इलाज वाले स्ट्रेन से बढ़ी मुश्किलें
इस बार तबाही के केंद्र में बंडिबुग्यो इबोला स्ट्रेन है। यह वायरस का बेहद दुर्लभ और खतरनाक प्रकार माना जाता है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस विशिष्ट स्ट्रेन के लिए फिलहाल कोई स्वीकृत वैक्सीन या सटीक इलाज उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर केवल लक्षणों के आधार पर इलाज कर रहे हैं।
इटुरी प्रांत की राजधानी बुनिया पहुंचे डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने स्थानीय लोगों से मुलाकात की। उन्होंने कहा कि इस महामारी से निपटने के लिए जनता का सहयोग सबसे जरूरी है। जब तक समुदाय के लोग आगे नहीं आएंगे, तब तक स्वास्थ्य कर्मियों के लिए इस जानलेवा बीमारी को रोकना नामुमकिन होगा।
अंधविश्वास और हिंसा बन रही है बड़ी बाधा
जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य टीम को भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। कई इलाकों में बीमारी को लेकर गलत जानकारियां और खौफ फैला है। स्थानीय परंपराओं के कारण लोग सुरक्षित दफन प्रोटोकॉल का विरोध कर रहे हैं। कई जगहों पर स्वास्थ्य केंद्रों पर हमले भी हुए हैं।
यह बीमारी अब कांगो की सीमाओं को पार कर चुकी है। पड़ोसी देश उगांडा में भी इबोला के कई मामले सामने आए हैं, जहां एक मरीज की मौत हो चुकी है। वैश्विक खतरे को देखते हुए डब्ल्यूएचओ ने इसे अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर दिया है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूरोपीय संघ और अमेरिका ने करोड़ों डॉलर की मदद भेजी है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर संसाधनों की भारी कमी बनी हुई है। अफ्रीका सीडीसी के मुताबिक मरीजों की संख्या के मुकाबले स्वास्थ्य उपकरण और जरूरी फंड बेहद कम पड़ रहे हैं।
Asha Thakur

