दहेज की बलिवेदी पर कब तक चढ़ेंगी बेटियां? शिक्षित समाज में भी छिपे हैं ये 8 खूनी संकेत, माता-पिता हो जाएं सावधान!

Delhi News: हाल ही में भोपाल की त्विषा शर्मा, ग्रेटर नोएडा की दीपिका नागर और नोएडा की पूजा जैसी होनहार बेटियों की दहेज के कारण जान जाने की खबरों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। कड़े कानून होने के बावजूद यह कुत्सित प्रथा हमारे शिक्षित और प्रगतिशील समाज में लगातार पैर पसारे हुए है।

महानगरों के संपन्न और उच्च शिक्षित परिवारों में भी यह खूनी खेल धड़ल्ले से खेला जा रहा है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की डराने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, दहेज हत्या के मामलों में देश की राजधानी दिल्ली सबसे शीर्ष पायदान पर है। आंकड़े बताते हैं कि देश में हर 90 मिनट में एक मासूम महिला दहेज की लालच के कारण दम तोड़ रही है।

पारंपरिक सोच और स्टेटस सिंबल बना सबसे बड़ा जोखिम

अक्सर माता-पिता जब बेटी के लिए वर की तलाश करते हैं, तो उनकी कसौटी सिर्फ लड़के की बड़ी नौकरी, भारी बैंक बैलेंस, समाज में ऊंचा ओहदा और उसका हैंडसम दिखना होता है। एम्स (AIIMS), दिल्ली की पूर्व मनोवैज्ञानिक सलाहकार सृष्टि अस्थाना बिष्ट के अनुसार, यही पारंपरिक ढर्रा आज के समय में सबसे बड़ा जोखिम बनता जा रहा है।

अच्छे घर और स्टेटस के चक्कर में लड़की का परिवार उन गंभीर संकेतों को पूरी तरह अनदेखा कर देता है, जिनकी कीमत बाद में बिटिया को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। शादी तय होने के दौरान लड़के वालों के हाव-भाव और उनकी भाषा को बारीकी से परखना माता-पिता के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है।

गलत समझाइश और बेटियों पर सामाजिक दबाव

समाजशास्त्री डॉ. ऋतु सारस्वत बताती हैं कि हमारे देश के मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग में तलाक को आज भी एक बहुत बड़ा कलंक माना जाता है। विदाई के समय ‘अब वही तुम्हारा घर है और वहीं से तुम्हारी अर्थी निकलेगी’ जैसी रूढ़िवादी बातें बेटियों के कोमल मन पर बहुत गहरा और नकारात्मक प्रभाव छोड़ती हैं।

लाइफ कोच और साइकोथेरेपिस्ट स्नेहा वशिष्ठ के अनुसार, जब बेटियां ससुराल में होने वाले मानसिक शोषण या दहेज के तानों का दर्द अपने मायके में बयां करती हैं, तो उन्हें अक्सर ‘समय के साथ सब ठीक हो जाएगा’ जैसी पुरानी समझाइश देकर चुप करा दिया जाता है। यही उपेक्षा उन्हें मौत के दरवाजे तक धकेल देती है।

शादी से पहले और बाद के इन 8 खूनी संकेतों को कभी न करें इग्नोर

रिलेशनशिप एक्सपर्ट्स और समाजशास्त्रियों के अनुसार, अगर शादी के पहले या बाद में नीचे दिए गए संकेतों में से कुछ भी नजर आए, तो माता-पिता को तुरंत कड़े कदम उठाने चाहिए:

  • मांग का बढ़ना: अगर वर-पक्ष साधारण शादी से साफ मना करे और लगातार अपनी नई-नई मांगें बढ़ाता जाए।
  • अहंकार और दंभ: लड़के वाले अगर बार-बार अपने पैसे और ऊंचे स्टेटस का दिखावा करें और मायके को नीचा दिखाएं।
  • जल्दबाजी करना: अगर लड़का या उसके घरवाले बिना पूरी जांच-पड़ताल के शादी की तारीख के लिए बहुत ज्यादा जल्दबाजी करें।
  • करियर पर पाबंदी: यदि शादी से पहले ही वे लड़की की पढ़ाई रुकवाने या उसे नौकरी छुड़वाने का दबाव बनाने लगें।
  • व्यक्तित्व पर उंगली उठाना: लड़की के नैन-नक्श, रंग-रूप या उसके पहनावे को लेकर बार-बार असंतुष्टि जाहिर करना।
  • मायके से दूरी बनाना: शादी के बाद यदि लड़की को अपने माता-पिता से मिलने या फोन पर बात करने की आजादी न दी जाए।
  • दहेज के ताने: ससुराल में छोटी-छोटी बातों पर मायके से कम सामान या कम पैसे मिलने के उलाहने दिए जा रहे हों।
  • व्यवहार में बदलाव: यदि बिटिया शादी के बाद अचानक बहुत गुमसुम रहने लगे, डरने लगे या समाज से पूरी तरह कट जाए।

रिश्तों में नहीं होता कोई बैक गियर

डॉ. ऋतु सारस्वत कहती हैं कि जिंदगी की गाड़ी में कभी कोई बैक गियर नहीं होता है। अगर एक बार भी ससुराल में बेटी के आत्मसम्मान को ठेस पहुंची है या दहेज को लेकर प्रताड़ित किया गया है, तो यह मान लेना कि आगे सब ठीक हो जाएगा, सबसे बड़ी मूर्खता होगी। मानसिक विकृति कभी ठीक नहीं होती।

रिलेशनशिप एक्सपर्ट डॉ. रचना खन्ना सिंह के मुताबिक, जब विवाह को पवित्र रिश्ते की जगह वित्तीय निकासी यानी कमाई का साधन बना दिया जाए, तो वह सबसे खतरनाक मोड़ होता है। लड़के वाले अक्सर इसे अपना शक्ति प्रदर्शन मानते हैं, जहां वे लड़की को एक जीती-जागती इंसान की जगह सिर्फ एक वस्तु समझने लगते हैं।

बेटियों को ‘ना’ कहना सिखाना बेहद जरूरी

स्नेहा वशिष्ठ के अनुसार, आज की नई पीढ़ी अब इस सामाजिक कुचक्र को तोड़ना चाहती है। युवा अब समझ रहे हैं कि उन्हें खुद अपनी जिंदगी से ऐसी जानलेवा कुरीतियों को उखाड़ फेंकना होगा। इसके लिए बचपन से ही बेटियों की परवरिश के दौरान उन्हें हर गलत बात के खिलाफ मजबूती से ‘ना’ कहना सिखाना होगा।

माता-पिता को अपनी बेटियों को यह अटूट विश्वास दिलाना होगा कि उनका मायका हमेशा उनके साथ खड़ा है। किसी भी सामाजिक स्टेटस या लोक-लाज के डर से अपनी बेटी के आत्मविश्वास को कभी कमजोर न होने दें। अगर बेटी किसी रिश्ते में खुश नहीं है, तो उसका खुलकर समर्थन करें और उसे उस नरक से सुरक्षित बाहर निकालें।

Author: Pallavi Sharma

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