उत्तराखंड के पहाड़ों में ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ ‘AI’ का वार: 5 मिनट में जांच, न दर्द न रेडिएशन

Uttarakhand News: देवभूमि की शांत वादियों में ब्रेस्ट कैंसर एक खामोश दुश्मन की तरह पांव पसार रहा है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और जागरूकता के अभाव में उत्तराखंड की महिलाओं के लिए यह बीमारी एक बड़ी चुनौती बन गई है। अक्सर अस्पतालों की दूरी और इलाज में देरी के कारण यह रोग जानलेवा साबित होता है। इस गंभीर संकट के बीच अब ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) आधारित ‘आइ ब्रेस्ट’ (iBreast) मशीन एक नई उम्मीद बनकर उभरी है। यह तकनीक समय रहते बीमारी की पहचान कर हजारों जिंदगियों को बचाने का माध्यम बन रही है।

सेंसर तकनीक से मिनटों में कैंसर की पहचान

स्वास्थ्य विभाग द्वारा तैनात की गई यह एआइ आधारित मशीन पूरी तरह पोर्टेबल और अत्याधुनिक है। करीब 15 लाख रुपये की लागत वाली यह मशीन सेंसर के जरिए ब्रेस्ट टिश्यू की कठोरता को मापती है। चूंकि कैंसरग्रस्त गांठें सामान्य ऊतकों की तुलना में अधिक सख्त होती हैं, इसलिए मशीन का एआइ सिस्टम तुरंत इसका विश्लेषण कर एक रंगीन मैप तैयार कर देता है। इस पूरी प्रक्रिया में मात्र 5 से 10 मिनट का समय लगता है। सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि इस जांच में न तो कोई दर्द होता है और न ही हानिकारक रेडिएशन का खतरा रहता है।

उत्तराखंड में 1602 नए मामले: स्क्रीनिंग दर चिंताजनक

राज्य में ब्रेस्ट कैंसर के बढ़ते आंकड़े स्वास्थ्य विभाग के लिए चिंता का विषय हैं। आधिकारिक जानकारी के अनुसार, वर्ष 2025 में उत्तराखंड में ब्रेस्ट कैंसर के 1602 नए मामले दर्ज किए गए हैं। चिंता की बात यह है कि प्रदेश में स्क्रीनिंग दर अभी भी महज 0.4 प्रतिशत है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। जागरूकता की कमी के कारण महिलाएं तब अस्पताल पहुंचती हैं जब कैंसर तीसरी या चौथी स्टेज पर पहुंच चुका होता है। एआइ तकनीक का उद्देश्य इसी स्क्रीनिंग दर को बढ़ाकर मृत्यु दर में कमी लाना है।

दुर्गम जिलों के लिए मोबाइल हेल्थ कैंप की शुरुआत

पहाड़ी जिलों जैसे पौड़ी, टिहरी, चमोली और पिथौरागढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच आज भी एक बड़ी चुनौती है। इन क्षेत्रों की महिलाओं को जांच के लिए बड़े शहरों के चक्कर न लगाने पड़ें, इसके लिए सरकार ‘मोबाइल हेल्थ कैंप’ का सहारा ले रही है। एआइ आधारित पोर्टेबल मशीनों को गांव-गांव ले जाया जा रहा है। वर्तमान में तीन मशीनें अलग-अलग जिलों में सक्रिय हैं, और स्वास्थ्य विभाग जल्द ही नई मशीनें मंगाने की तैयारी में है। इससे स्क्रीनिंग का दायरा तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।

शुरुआती पहचान से उपचार हुआ आसान

चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ब्रेस्ट कैंसर की पहचान पहले चरण (First Stage) में हो जाए, तो इसे पूरी तरह ठीक किया जा सकता है। आइ ब्रेस्ट डिवाइस इसी दिशा में क्रांतिकारी कदम है। दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों में तैनात स्वास्थ्य कर्मी इस डिवाइस के जरिए संदिग्ध मामलों को चिह्नित कर रहे हैं। जैसे ही मशीन में किसी गांठ या सख्ती के संकेत मिलते हैं, मरीज को तुरंत उच्चस्तरीय जांच (जैसे मैमोग्राफी या बायोप्सी) और उपचार के लिए बड़े केंद्रों पर रेफर कर दिया जाता है।

स्वास्थ्य विभाग का संकल्प: कैंसर मुक्त पहाड़

राज्य सरकार का लक्ष्य एआइ तकनीक के माध्यम से हर महिला तक जांच की सुविधा पहुंचाना है। उत्तराखंड के स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, यह तकनीक उन क्षेत्रों में वरदान साबित हो रही है जहां रेडिएशन वाली भारी-भरकम मशीनें ले जाना संभव नहीं है। समय पर पहचान होने से न केवल मरीज के बचने की संभावना बढ़ती है, बल्कि उपचार का खर्च भी कम हो जाता है। आने वाले समय में स्वास्थ्य विभाग इस विशेष जांच अभियान को ब्लॉक स्तर तक ले जाने की योजना पर काम कर रहा है।

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