Spiritual: सनातन धर्म में दीपक को केवल पूजा की एक साधारण वस्तु नहीं, बल्कि बेहद पवित्र और सर्वोच्च जीवन दर्शन का प्रतीक माना गया है। घर की दैनिक पूजा हो, मंदिर की भव्य आरती हो या कोई भी मांगलिक कार्य, दीप प्रज्वलन के बिना हर अनुष्ठान अधूरा माना जाता है।
वैदिक काल से जुड़ा है अग्नि का यह पावन संबंध
भारतीय संस्कृति में सदियों से दीपक जलाने की यह अद्भुत परंपरा निरंतर चली आ रही है। ऋग्वेद के एक अत्यंत पवित्र मंत्र में अग्नि देव की महिमा का बहुत सुंदर वर्णन मिलता है। वेद के अनुसार, अग्नि देव सामान्य मनुष्यों के बीच अमृत के समान साक्षात निवास करते हैं।
अग्नि तत्व को हमेशा से ही मनुष्यों और देवताओं के बीच एक मजबूत सेतु माना गया है। वह इंसानों को उत्तम ज्ञान देने वाली, सही मार्ग दिखाने वाली और जीवन में नई चेतना का संचार करने वाली दिव्य शक्ति है। दीपक में जलने वाली लौ सीधे तौर पर इसी पवित्र अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करती है।
अंधकार को मिटाकर सकारात्मक ऊर्जा लाता है प्रकाश
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब हम दीपक प्रज्वलित करते हैं तो केवल एक लौ नहीं जलाते, बल्कि अपने जीवन में असीम ज्ञान, नई आशा और सकारात्मक ऊर्जा का स्वागत करते हैं। दीपक का प्रकाश जिस प्रकार बाहरी अंधकार को दूर भगाता है, ठीक उसी तरह वह मानव मन के अज्ञान को भी नष्ट करता है।
शास्त्रों में माना गया है कि जिस स्थान पर नियमित रूप से शुद्ध दीपक जलता है, वहां नकारात्मक शक्तियां कभी नहीं टिकतीं। यही मुख्य कारण है कि सुबह और शाम के समय घर के मुख्य मंदिर में दीपक जलाना अनिवार्य माना गया है। यह ईश्वर के प्रति हमारी गहरी श्रद्धा प्रकट करने का एक उत्तम माध्यम है।
‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का देता है महान संदेश
दीपक हमें प्रसिद्ध उपनिषद मंत्र ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की याद दिलाता है, जिसका अर्थ है हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। दीपक का एक बेहद मर्मस्पर्शी संदेश यह भी है कि मनुष्य को स्वयं तपकर समाज को ज्ञान का उत्तम प्रकाश देना चाहिए।
जिस प्रकार एक छोटा सा दीया खुद जलकर आसपास के घने अंधकार को दूर करता है, उसी प्रकार व्यक्ति को भी अपने श्रेष्ठ ज्ञान, अच्छे कर्मों और सकारात्मक सोच से पूरे समाज में उजाला फैलाना चाहिए। यह लौ हमें सिखाती है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा हो, एक छोटी सी कोशिश उसे हरा सकती है।
Author: Pandit Balkrishan Sharma


