Lifestyle News: बचपन की यादों का जिक्र हो और मेलोडी टॉफी का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। दशक बीत जाने के बाद भी यह टॉफी आज भी उतनी ही लोकप्रिय है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इटली की पीएम मेलोनी को मेलोडी गिफ्ट की, जिससे एक बार फिर इस ‘चॉकलेटी’ टॉफी की चर्चा हर ओर हो रही है।
पारले की विरासत और मेलोडी का सफर
मेलोडी टॉफी को पारले प्रोडक्ट्स (Parle Products) ने 1983 में बाजार में उतारा था। 1929 में मोहनलाल दयाल चौहान द्वारा स्थापित यह कंपनी आज भारत की सबसे बड़ी बिस्किट निर्माता बन चुकी है। पारले का सफर छोटी कन्फेक्शनरी दुकान से शुरू होकर आज हजारों करोड़ के कारोबार तक पहुंच गया है, जो ‘स्वदेशी’ विकल्प के रूप में शुरू हुआ था।
वह मशहूर जिंगल जिसने इतिहास रचा
मेलोडी की मार्केटिंग के पीछे एक मास्टरस्ट्रोक था। विज्ञापन एजेंसी एवरेस्ट की टीम ने एक सरल और जिज्ञासा जगाने वाला कॉन्सेप्ट तैयार किया। कॉपीराइटर सुलेखा वाजपेयी की कलम से निकली लाइन, “मेलोडी खाओ, खुद जान जाओ,” इतनी हिट हुई कि यह आज भी लोगों की जुबान पर रटी हुई है। यह विज्ञापन ग्राहकों को टॉफी चखने के लिए प्रेरित करने में सफल रहा।
मार्केटिंग का बेहतरीन मानवीय पहलू
मेलोडी के टीवी विज्ञापनों ने इंसानी जिज्ञासा का अद्भुत इस्तेमाल किया। ग्रामीण और शहरी दोनों ही बाजारों को लक्षित करते हुए, इन विज्ञापनों ने टॉफी की बनावट और स्वाद को बखूबी पेश किया। ‘मेलोडी है चॉकलेट वाली’ के जिंगल ने इस ब्रांड को एक अलग पहचान दी, जिसने बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को अपना दीवाना बना दिया है।
आज भी है बाजार में धाक
फिल्म ‘छिछोरे’ जैसे बॉलीवुड संदर्भों ने इस क्लासिक जिंगल को नई पीढ़ी के बीच भी जीवंत रखा है। पारले प्रोडक्ट्स का वित्तीय प्रदर्शन भी मजबूत है, जिसका परिचालन राजस्व FY25 में 15,568 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। मेलोडी आज भी पारले के कन्फेक्शनरी पोर्टफोलियो का सबसे अहम और प्रिय उत्पाद बनी हुई है।
Author: Karuna Sen


