Delhi News: दिल्ली दंगों के आरोपियों की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न देने के अपने ही पुराने फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि जमानत एक सामान्य नियम है और जेल महज एक अपवाद है।
यूएपीए मामलों में भी लागू होगा जमानत का पुराना नियम
जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने इस साल जनवरी में आए फैसले की खुलकर आलोचना की। बेंच ने कहा कि यूएपीए के कड़े कानून के बावजूद किसी भी आरोपी को अनिश्चित काल तक सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता। सुनवाई में देरी को कोर्ट ने राहत देने का मुख्य आधार माना है।
बड़ी बेंच के ऐतिहासिक फैसले को छोटी बेंच नहीं बदल सकती
शीर्ष अदालत ने कहा कि न्यायिक अनुशासन बनाए रखना सभी अदालतों के लिए बेहद जरूरी है। साल 2021 के ऐतिहासिक नजीब मामले में तीन जजों की बड़ी बेंच ने कानून तय किया था। कोई भी छोटी बेंच अपनी मर्जी से उस बड़े फैसले के प्रभाव को कतई कमजोर या खारिज नहीं कर सकती है।
नार्को टेररिज्म के आरोपी को जमानत देते हुए की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी नार्को-टेररिज्म मामले के एक आरोपी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए की। अंद्राबी पिछले पांच साल से लगातार जेल में बंद था। अदालत ने स्पष्ट किया कि निचली अदालतों और हाई कोर्ट को भी इस बाध्यकारी और स्थापित कानून का पूरी तरह पालन करना होगा।
इस नए आदेश के बाद अब कानूनी गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है। लंबे समय से बंद कैदियों के लिए यह फैसला एक बड़ी उम्मीद बनकर आया है। विशेष रूप से यूएपीए कानून के तहत बंद अन्य आरोपियों की कानूनी रणनीति पर भी अब इसका सीधा और बड़ा असर देखने को मिल सकता है।
Author: Adv Anuradha Rajput


