ईरान-अमेरिका युद्ध: पाकिस्तान ने दी बातचीत की मेजबानी की पेशकश, इस्लामाबाद में हो सकती है वार्ता

World News: पाकिस्तान ने औपचारिक तौर पर ईरान और अमेरिका को युद्ध खत्म करने के लिए बातचीत की मेजबानी की पेशकश कर दी है। इस बातचीत के इस्लामाबाद में होने की संभावना है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा कि अगर अमेरिका और ईरान राजी हों तो पाकिस्तान सार्थक बातचीत कराने के लिए तैयार है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शहबाज शरीफ का यह बयान शेयर किया है।

पाकिस्तान की औपचारिक पेशकश

प्रधानमंत्रीशहबाज शरीफ ने मंगलवार शाम एक्स पर पोस्ट कर कहा, ‘पाकिस्तान मध्य पूर्व में जारी युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत के जरिए कोशिशों का पूरा समर्थन करता है।’ उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका और ईरान राजी हों तो पाकिस्तान बातचीत कराने के लिए तैयार है। इससे पहले ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर दावा किया था कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है। ईरान ने इन बातचीतों का खंडन किया था, लेकिन बाद में खबरें आईं कि यह बातचीत पाकिस्तान की मध्यस्थता में हो रही है।

पाकिस्तान क्यों है मजबूत मध्यस्थ?

विश्लेषकोंका कहना है कि पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान दोनों से ही नजदीकियां हैं। यही बात पाकिस्तान को एक मजबूत मध्यस्थ बनाती है। ईरान में पाकिस्तान के पूर्व राजदूत आसिफ दुर्रानी कहते हैं, ‘क्षेत्र में ऐसा कौन सा दूसरा देश है, जिसके ईरान से बेहतर संबंध हों? खाड़ी देशों और तुर्की के साथ ईरान के संबंधों में तनाव है। ऐसे में पाकिस्तान ही एक बेहतर मध्यस्थ बन सकता है।’

पाकिस्तान क्या हासिल करना चाहता है?

विश्लेषकोंके अनुसार, पड़ोसी देश होने के नाते पाकिस्तान भी ईरान में युद्ध से प्रभावित हो रहा है। तनाव में कमी आने से उसे आर्थिक और राजनीतिक राहत मिल सकती है। प्रोफेसर मोहम्मद शुएब कहते हैं, ‘तनाव कम होने से पाकिस्तान को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक फायदे होंगे। स्थिरता आने से व्यापार पर दबाव कम होगा, खासकर ईंधन और तेल के बाजार में राहत मिलेगी।’ पूर्व राजदूत आसिफ दुर्रानी का कहना है कि पाकिस्तान ने मध्यस्थ बनने की पेशकश किसी लाभ के लिए नहीं की, बल्कि पड़ोसी देश होने के नाते युद्ध का असर पाकिस्तान पर भी पड़ रहा है।

क्या पाकिस्तान बन सकता है गारंटर?

ईरान कोअमेरिका पर भरोसा नहीं है। पिछले साल कतर और ओमान की मध्यस्थता में बातचीत हुई थी, लेकिन दोनों बार ईरान पर हमलों के कारण यह प्रक्रिया रुक गई थी। प्रोफेसर मोहम्मद शुएब कहते हैं, ‘पाकिस्तान इस प्रक्रिया या किसी समझौते की गारंटी नहीं देगा, बल्कि मध्यस्थ के रूप में पक्षों के बीच संपर्क बढ़ाएगा और सुनिश्चित करेगा कि दोनों देश अपने वादों का पालन करें।’ पूर्व अमेरिकी राजनयिक एलिजाबेथ ट्रेल्कल्ड का मानना है कि अगर पाकिस्तान किसी समझौते को करवाने में सफल रहता है, तो यह एक बड़ी कूटनीतिक सफलता होगी।

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